आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
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आयुर्वेद-दर्शन
इसी तरह धातुप्रसाद विषयक ज्ञान में भी प्रगति हुई। धातुप्रसाद को आरंभ में केवल ज्ञानवाहक पंचोद्विगद्रव्य कहते थे किंतु बाद में 'चेष्टावाहक' भी कहा जाने लगा। अब जब कि समस्त शारीर धातुओं का प्रधान घटक प्राणद्रव्य है तब धातुप्रसाद का भी प्रधान घटक प्राण ही होना चाहिये और शरीर गत समस्त चेष्टाएँ भी प्राण के कारण ही होना चाहिये। अतः धातुपंचकवादियों ने धातुप्रसाद का वायु में समन्वय करने के हेतु से उक्त 'सर्वाहिचेष्टावातेन' इत्यादि विधान किया।
इस तरह ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद जैसे द्रव्यों का श्लेष्मपित्तवातों में अंतर्भाव किये जाने पर उनको (श्लेष्मपित्तवातों को) मलवर्ग में रखना अनुचित प्रतीत होने लगा और ओज ऊष्मा व धातुप्रसाद का पृथक् उल्लेख करने की आवश्यकता भी नहीं रही। सिवाय इस समय गुणप्रसादाख्यवर्ग के विषय में भी समुचित ज्ञान हो चुका था बल्कि यूं कहना चाहिये कि औजस् और तैजस् समस्त द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही रूपांतर प्रतीत होने लग गये थे। ( विज्ञान दृष्ट्या भी औजस् तैजस् द्रव्य, गुणप्रसादाख्य वर्ग के ही दो प्रधान रूप हैं; इन रूपों में ही इस वर्ग की उपलब्धि होती है। ) इन सब कारणों से शारीरधातुओं का दूसरी बार वर्गीकरण हुआ।
जैसा कि:—