भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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वायोविद का रसवाद आर त्रिधातु सिद्धांत

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दूसरा वर्गीकरण.

शारीरधातवस्त्वेवं (अथवा शारीरधातुगुणाः) द्विविधाः संप्रहेण मलभूताः प्रसाद-भताश्च । तत्र मलभूतास्ते ये शरीरस्य बाधकराः स्युः । तद्यथा-शरीरच्छिद्रेषूपदेहाः पृथक्जनमानो बहिर्मुखः परिपकाश्चधातवः प्रकुपिताश्च वातपित्तश्लेष्माणां ये चान्येऽपिकेचित् शरीरे तिष्ठतो भावाः शरीरस्योपघातायोपतिष्ठन्ते सर्वास्तान् मले प्रचक्षमहे । इतरास्तु प्रसादे, गुर्वादींश्चद्रव-तान् 'गुण' भेदेन, रसादींश्च शुक्तांन् 'द्रव्य' भेदेन ।

( च. शा. अ. ६ )

इसमें बाधकर और अबाधकर की दृष्टि से मल व प्रसाद संज्ञक दो प्रधान वर्ग किये गये हैं और तदनुसार 'मल' वर्ग में केवल प्रकुपित अर्थात् बाधकर वातपित्त श्लेष्माओं का उल्लेख किया है; अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का नहीं । प्रसाद वर्ग में गुणप्रसादाख्य और द्रव्य प्रसादाख्य इस तरह दो वर्ग किये हैं । तहां गुण प्रसादाख्य वर्ग के प्रकारांतर ही ओज, तेज व धातुप्रसाद हैं और समस्त द्रव्य-प्रसादाख्य वर्ग इनका ही बना हुआ है । चूंकि जब कि इस वर्गीकरण के 'मल' वर्ग में प्रकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का स्पष्ट उल्लेख है तब अकुपित वातपित्तश्लेष्माओं का 'प्रसाद' वर्ग में स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये था । पर सचेतन द्रव्यों के इस वर्गीकरण में गुण प्रसादाख्य वर्ग का उल्लेख करना ही वचित