आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 93, कुल 235 में से
संदर्भ में पढ़ेंवायोंविद् का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत
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सर्व प्रथम पैदा होती है; गर्भांकुर उसी से बनता है और अन्य प्रकृतियाँ इस पर ही आगे संस्कार करती हैं। प्रायः इसी हेतु से कुछ संप्रदाय उसीका प्रधानतया उल्लेख करते हैं। जैसा कि:—
शुक्रशोणितसंयोगे यो भवेद्वैष उत्कटः।
प्रकृति जायते तेन तस्या मे लक्षणं शृणु। (सु.सं.)
गर्भावक्रांतिदृष्ट्या शुक्र शोणित शब्दों से बीज व फल संज्ञक अणु अवयव [अणुभूत, भूताणु, जीवाणु,] अभिप्रेत हैं। उक्त दोनों प्रकार के अथवा सभी प्रकार के अणु अवयवों
१ अणु अवयवों के विषय में यह कहा गया कि है ‘शरीरान्वयास्तु परमाणु भेदेन अपरिसंख्येया भवेति; अति बहुव्यात्, अतिसौक्ष्म्यात् अर्तीन्द्रियत्वाच्च’ (च. शा. अ. ७) इन अगणित, अति सूक्ष्म, अर्तीन्द्रिय और सचेतन परमाणुओं का प्राश्नात्य वैज्ञानिकों ने ‘अणुवीक्षण’ शब्द द्वारा ज्ञान प्राप्त किया है। इन जीवाणुओं के आकार-प्रकार भिन्न २ धातुओं के तथा अवयवों के अनुसार भिन्न २ होते हैं। इनकी सूक्ष्मता ३००००० अंश अंगुल के बराबर है। सामन्यतः इनके दो प्रकार हैं; सावरण और निरावरण उद्भिदों में सावरण रहते हैं और मनुष्यों में निरावरण। इनका शरीर सुरन्ध्रे के सदृश बिलकुल मुलायम होता है। यह जीवनस (Protoplasma) नामक द्रव्य का बना हुआ है। जीवनस के बीज में मीठी के सदृश एक भाग है जिसको कि ‘जीवनायतन (Nucleus)’ कहते हैं। सिवाय एक ‘आकर्षक केंद्र (Attraction Sphere)’ नामक भाग है जो कि जीवनायतन अधीरा रहता है। इस तरह जीवाणु के तीन प्रधान अंग हैं। जीवनस, जीवनायतन और आकर्षक केंद्र।