आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
पृष्ठ 94, कुल 235 में से
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में सूक्ष्म घटकों के रूप में बात [ धातुप्रसाद, तथा वायवीय द्रव्य ] पित्त [ तेज, व अग्नि ] श्लेष्मा [ ओज व उदक ] ओंका अस्तित्व रहता है ।
जीवनरस में एक जाली है जिसको ' जीवनकोष ' ( Spongioplasm ) कहते हैं । इसमें ' जीवन तरल ' [ Hyalo Plasm ] भरा रहता है । जीवनरस इन दो पदार्थों का बना हुआ है ।
जीवनायतन पर एक आवरण है; इस आवरण के भीतर भी जालीदार कोष है और इस ' जीवनायतन कोष ' ( Chromoplasm ) नामक तरल है । जीवनायतन के बीच में एक ग्रंथि सदृश भाग है; उसको ' जीवन-ग्रंथि ' ( Nucleoli ) कहते हैं ।
आकर्षक केंद्र के मध्य में ' आकर्षक बिंदु ' ( Centriole ) नामक भाग है उसके आसमतात् आरों की सी रचना है ।
इन जीवाणुओं में ग्रहण, विसर्जन, प्रजनन, गमन आदि चेतना व्यंजक व्यापार होते हैं । उक्त व्यापारों का जीवनायतन के साथ घनिष्ठ संबंध है । एक अणु अवयव से दूसरे अणु अवयव का प्रजनन ' औद्भिज पद्धति ' से होता है । प्रजनन के समय प्रथम आकर्षकबिंदु विभाजित होता है । इस प्रकार को ' प्रत्यक्ष प्रजनन ' कहते हैं । कहीं २ प्रथम जीवनग्रंथि ही खुलती है और उसके जालीदार भाग के तंतु बनते हैं । इन तंतुओं को ' जीवनायतनमूलतंतु ' ( Chromosomes ) कहते हैं । इन तंतुओं के द्वारा होनेवाले प्रजनन को ' अप्रत्यक्षप्रजनन ' कहते हैं ।
चूंकि जबकि बीज, फल और वंशांकुर भी विशिष्ट प्रकार के 'अणु-अवयव' ही हैं तब उनमें उक्त सामान्य बातों का रहना स्वाभाविक है ।