भारतकोश
आयुर्वेद दर्शन

आयुर्वेद दर्शन

Ayurveda Darshan

वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा

स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)

DevanagariHindipublished235 पृष्ठ

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बार्शोविद का रसवाद और त्रिधातु सिद्धांत

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वर्तमान वैज्ञानिकों द्वारा अणुअवयवों का रासायनिक पृथक्करण करके यह देखा गया है कि उसके जीवनरस में:-

बीज, लंबे व पूंछदार होते हैं। इनके शिर, ग्रीवा, घड, पूँछ, व पुच्छकेसर इतने अवयव रहते हैं। शिर, त्रिकोण, नुकीला और अन्य अंगों से मोटा रहता है। इसी में उसका जीवनायतन रहता है। ग्रीवा सक्डी रहती है और इसी में इसका आकर्षककेंद्र रहता है। फल की अपेक्षा बीज बहुत सूक्ष्म रहता है यह अपनी पूँछ की हलचल से स्थानांतर करता है और नुकीले मुख से फल में प्रवेश करता है।

फल का आकार चपटा और गोल है। इसपर एक पारदर्शक कवच है; उसको ' फलधवलकवच ' ( Zona Pellucida ) कहते हैं। फल में भी जीवनायतन, जीवनायतन ग्रंथि और आकर्षक केंद्र रहते हैं। इसके जीवनरस में वंशांश ( तेज ) अधिक रहता है।

धानवंतरो का कथन है कि ' शुक्र और आर्तव में अणु विशिष्ट भूतों का भी अस्तित्व रहता है '। ये अणु विशिष्ट भूत, बीज व फल ही हैं। और यह भी कथन है कि 'इन भूतों के परस्पर अनुग्रह, अनु-प्रवेश और उपकार से पैदा होने वाला गर्भ, ( अर्थात् वंशांकुर ) गर्भाशय में प्रविष्ट होता है। ( सु. शा. अ. ३ ग. १-२ ) इन अनु-ग्रहादि व्यापारों के वास्तविक रूप के विषय में यह ध्यान में रखना चाहिये कि बीज, अपनी पूँछ की हलचल से फल को पकड़ने ( ग्रह ) का यत्न करता है। उसके लिये वह गर्भाशय में, फलवाहिनीयों में और अंतःफल में भी प्रवास करता है। इस तरह फलग्रह हो जाने पर वह अपने नुकीले मुख से फल में अनुप्रवेश करता है। बाद में