भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 105

अष्टमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ५३

प्रायत्ये संजाते शौचमुक्तम् । इह तु पात्रान्तरान्नहस्तस्य शौचमिति विशेषः । तथा च वसिष्ठः— चरन्नभ्यवहार्येषु उच्छिष्टं यदि संस्पृशेत् । भूमौ निधाय तत्पात्रमाचम्य प्रचरेत्पुनः ॥ इति ॥ २४ ॥

अथ चेदद्भिरुच्छिष्टी स्यात् तदुदस्याचम्यादास्यानद्भिः प्रोक्षेत् ॥ २४ ॥

एतदेव विपरीतममत्रे ॥ २५ ॥

अनु०—यदि हाथ में जल लिये हुए अशुद्ध हो जाय तो उसे रखकर आचमन करे और ग्रहण करते समय जल छिड़के ॥ २४ ॥

अनु०—यह मिट्टी के पात्र के विषय में बताये गये नियम के विपरीत है ॥२५॥

टि०—यहाँ तात्पर्य यह है कि मिट्टी का पात्र यदि अपवित्र हो जाय तो उसे फिर ग्रहण नहीं किया जाता। अन्य प्रकार के पात्रों का पुनः अग्नि से दाह किया जाता है।

अमत्रं मृन्मयपात्रमिहाऽभिप्रेतम् । तस्याऽत्यन्तोपहतस्योद्धसनमात्रमेव नाऽऽदानमित्यर्थः । इतरस्य पुनर्दाह एव ॥ २४-२५ ॥

वानस्पत्ये विकल्पः ॥ २६ ॥

अनु०—लकड़ी के पात्रों के विषय में विकल्प नियम है। (अर्थात् उसका त्याग भी किया जा सकता है और पुनः ग्रहण भी किया जा सकता है) ॥ २६ ॥

वानस्पत्ये वार्क्षे पात्रेऽप्रयते सति ¹आदानमुद्धसनं वा विकल्पः उपहतिविशेषापेक्षया । आचमनं तु स्थितमेव ॥ २६ ॥

पुरुषेण संयुक्तद्रव्यस्याऽप्रायत्ये शौचमुक्तम् । अधुना वियुक्तावस्थायामाह—

²तैजसानामुच्छिष्टानां गोशकृन्मृद्भस्मभिः परिमार्जनमन्यतमेन वा ॥ २७ ॥

अनु०—अशुद्ध हुए धातु के पात्रों को गोबर, मिट्टी, और भस्म से अथवा इनमें से किसी एक से मले ॥ २७ ॥


१. आदानस्य विकल्पः, इति क० पु० २, See. मनु from. ५. ११४ to १२४. कौशेयाविकयोरूषैः कुतपानामरिष्टकैः। श्रीफलैरंशु पट्टानां क्षौमाणां गौरसर्षपैः ॥ क्षौमवच्छङ्खशुक्तीनामश्मिस्यन्दतमयस्य च । शुद्धिविजानता कार्या गोमूत्रेणोदकेन वा ॥ इति स्मृत्यन्तरवचनमेतत्संवादि ।