भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 486 में से

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५४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ द्रव्यशुद्धिः

उपघातापेक्षया द्रव्याणां समुच्चयविकल्पौ द्रष्टव्यौ । उदकं पुनस्सर्वत्रानुवर्तते ॥ २७ ॥

अथ विशिष्टानां तैजसानां शौचान्तरमाह—

ताम्ररजतसुवर्णानामम्लैः ॥ २८ ॥

**अनु०—**तांबे चांदी और सोने के पात्रों के अपवित्र होने पर उनको अम्ल से शुद्ध करे ॥ २८ ॥

परिमार्जनमित्यनुवर्तते । सलेपानामेतत् । निर्लेपानां तु पूर्वोक्तानामन्यतमेनैव । तथा च वसिष्ठः—'अद्भिरेव काञ्चनं पूयते तथा रजतम्' इति ॥ २८ ॥

अमत्राणां दहनम् ॥ २९ ॥

अनु०—( स्पर्श मात्र से दूषित ) मिट्टी के पात्रों का अग्नि पर दाह करने से शुद्धि होती है ॥ २९ ॥

स्पर्शमात्रादुच्छिष्टानां मृन्मयानां पुनर्दाहः शौचमाम्नातम् । अनर्हाप्रायत्ययुक्तस्पर्शे तु प्रोक्षणमेव ॥ २९ ॥

दारवाणां तक्षणम् ॥ ३० ॥

**अनु०—**लकड़ी के बने पात्रों के दूषित होने पर उनको छीलने पर शुद्धि होती है ॥ ३० ॥

शौचमित्यनुवर्तते ॥ ३० ॥

वैणवानां गोमयेन ॥ ३१ ॥

**अनु०—**बाँस से बने हुए उपकरणों की शुद्धि गोबर से होती है ॥ ३१ ॥

परिमार्जनमिति शेषः । विदलादीनामशुचिस्पृष्टानामेतत् ॥ ३१ ॥

फलमयानां गोवालरज्ज्वा ॥ ३२ ॥

**अनु०—**फल ( बिल्व, नारियल आदि ) से बने हुए पात्रों की शुद्धि गौ के केशों से बनी रज्जु से रगड़ने पर होती है ॥ ३२ ॥

बिल्वनालिकेरादिफलविकाराणां गोवालरज्ज्वा । परिमार्जनम् । रज्जुग्रहणं बालबहुत्वोपलक्षणार्थम् । तथा च वसिष्ठः—'गोबालैः ( परिमार्जनं ) फलमयानाम्' ॥ इति ॥ ३२ ॥

कृष्णाजिनानां विल्वतण्डुलैः ॥ ३३ ॥

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