बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 107, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ५५
अनु०—काले मृग का चर्म पिसे हुए बिल्व और चावल के लेप द्वारा शुद्ध होता है ॥ ३३ ॥
बिल्वतण्डुलान् पिष्ट्वाऽवलेपनं कार्यमित्यर्थः ॥ ३३ ॥
कुतपानामरिष्टैः ॥ ३४ ॥
अनु०—कुतपानाम के पर्वतीय बकरे के रोम से बनी वस्तुओं की शुद्धि रीठी से होती है ॥ ३४ ॥
कुतपा नाम पर्वतीयच्छागरोमनिर्मिताः कम्बला उच्यन्ते । ¹अरिष्टैः पूय-वृक्षफलैः ॥ ३४ ॥
और्णानामादित्येन ॥ ३५ ॥
अनु०—ऊन के वस्त्रों की शुद्धि सूर्य की किरणों से होती है ॥ ३५ ॥
ऊर्णा अविलोमानि । तद्विकाराणां प्रावरणादीनामादित्यातपेन शुद्धिः ॥३५॥
²क्षौमाणां गौरसर्षपकल्केन ॥ ३६ ॥
अनु०—रेशमी वस्त्रों की शुद्धि पीले सरसों के लेप से होती है ॥ ३६ ॥
क्षुमा अतसी तद्विकाराणाम् ॥ ३६ ॥
मृदा चेलानाम् ॥ ३७ ॥
अनु०—सूती वस्त्रों की शुद्धि मिट्टी से होती है ॥ ३७ ॥
कार्पासमयानां मृदा शुद्धिः ॥ ३७ ॥
चेलवत् चर्मणाम् ॥ ३८ ॥
अनु०—( कृष्णमृग चर्म के अतिरिक्त अन्य ) चर्म से बने वस्त्रादि की शुद्धि भी सूती वस्त्र के समान ही ( मिट्टी से ) होती है ॥ ३८ ॥
कृष्णाजिनव्यतिरिक्तानामिति शेषः ॥ ३८ ॥
³तैजसवदुपलमणीनाम् ॥ ३९ ॥
अनु०—पत्थरों और मणियों की शुद्धि धातुनिर्मित पदार्थों के समान ही ( गोबर, मिट्टी, भस्म से ) होती है ॥ ३९ ॥
१. रीठी इति भाषायाम् ।
२. "गौरसर्षपकल्केन क्षौमजानाम्" इति वसिष्ठः ( व० ३–५० )
३. तैजसवदुपलमणीनां, मणिवच्छङ्खशुक्तीनां, दारुवदस्थ्नां रज्जुविदलचर्मणां चेलवच्छौचम् । इति वसिष्ठः ( व० ३–४९ )