बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धिः |
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उपलानां मणीनां च गोशकृदादिभिश्शुद्धिः ॥ ३९ ॥
दारुवदस्थ्नाम् ॥ ४० ॥
**अनु०—**अस्थिनिर्मित पदार्थों की शुद्धि काष्ठ की वस्तुओं के समान ही ( छोलकर ) होती है ॥ ४० ॥
तक्षणमित्यर्थः ॥ ४० ॥
क्षौमवच्छङ्खशृङ्गशुक्तिदन्तानाम् ॥ ४१ ॥
**अनु०—**शङ्ख, सींग, सीप और हाथी दाँत की वस्तुओं की शुद्धि रेशमी वस्त्र के समान ( पीले सरसों के लेप द्वारा ) होती है ॥ ४१ ॥
गौरसर्षपकल्केन शौचं कार्यम् ॥ ४१ ॥
पयसा वा ॥ ४२ ॥
**अनु०—**अथवा दूध से धोने से भी उनकी शुद्धि होती है ॥ ४२ ॥
प्रक्षालनमिति शेषः ॥ ४२ ॥
चक्षुर्घाणानुकूल्याद्वा मूत्रपुरीषासृक्शुक्लकुणपस्पृष्टानां पूर्वोक्तानामन्यतमेन त्रस्सप्तकृत्वः परिमार्जनम् ॥ ४३ ॥
**अनु०—**यदि देखने या सूंघने में अनुकूल प्रतीत होते हों तो मूत्र, मल, रक्त, वीर्य, या मृतक शरीर से दूषित पदार्थों को ऊपर बताये गये ( गोबर आदि ) किसी भी पदार्थ से तीन सात-सात बार करके परिमार्जन करे ॥ ४३ ॥
**टि०—**मूत्रादि से शरीरस्थ बारह प्रकार के मलों का उल्लेख है। इनकी गणना गोविन्दस्वामी ने अपनी व्याख्या में की है। यहाँ केवल इन मलों से स्पृष्ट वस्तुओं की शुद्धि का ही नियम दिया गया है।
मूत्रादिग्रहणं द्वादशमलप्रदर्शनार्थम्। तानि च मनुना प्रदर्शितानि—
वसा शुक्रमसृङ्मज्जा मूत्रविट्कर्णविण्णखाः।
श्लेष्माश्रु दूषिका स्वेदो द्वादशैते नृणां मलाः ॥
पूर्वोक्तानां गोशकृदादीनामन्यतमेन शौचम्। एतच्च परिमार्जनं तैजसानामुच्छिष्टमात्रदुष्टानां वेदितव्यम्। परिमार्जनमुल्लेखनं पुनः-करणमिति यथोपघातं कर्तव्यम्। तथा च शङ्खः¹—'कुणपरेतोऽसृङ्मूत्रपुरीषोपहतानां आवर्तनमुल्लेखनं भस्मना परिमार्जनमुत्सर्गः' ॥ इति। अत्राऽऽवर्तनशब्देन पुनः करणमुच्यते। तत्रैवं व्यवस्था—स्पृष्टमात्राणां त्रिसप्तकृत्वः परिमार्जनम्।
१. मुद्रितशङ्खस्मृतौ नास्तीदं वचनम्।