बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 109, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ५७
अल्पकालोपहतानामुल्लेखनम् । चिरकालोपहतानामाघर्तनम् । अत्यन्तोपह- तानां त्याग इति ॥ ४३ ॥
अतैजसानामेवंभूतानामुत्सर्गः ॥ ४४ ॥
अनु०— जो वस्तुएं धातुनिर्मित न हों और इस प्रकार मूत्रादि के संसर्ग से अपवित्र हों उनका त्याग कर देना चाहिए ॥ ४४ ॥
एवंभूतानामित्यन्तमलिनानां त्यागः । तेषामेव 'यथासम्भवमुत्सेदनं सन्मात्रच्छेदश्च' इति शङ्खवचनात् ॥ ४४ ॥
वचनाद्यज्ञे चमसपात्राणाम् ॥ ४५ ॥
अनु०— वेद के वचनानुसार यज्ञीय चमसपात्र उच्छिष्ठ दोष से अशुद्ध नहीं होता ॥ ४५ ॥
टि०— ब्यूह्लर के अनुसार इस सूत्र का अर्थ इस प्रकार होगा—चमस आदि पात्रों की यज्ञ में शुद्धि वेदोक्त नियम के अनुसार करनी चाहिए।
चमसानां पात्राणामुच्छिष्टस्पर्शदोषो नाऽस्तीति शेषः । मूत्राद्युपहतानां तु त्याग एव ॥ ४५ ॥
किं तद्वचनमित्यत आह —
न सोमेनोच्छिष्टा भवन्तीति श्रुतिः ॥ ४६ ॥
अनु०— सोम के स्पर्श से ( पुरुष, चमस पात्र या अन्य पात्र ) दूषित नहीं होते हैं, ऐसा श्रुतिवचन है ॥ ४६ ॥
सोमेनोच्छिष्टाः पुरुषास्सोमाश्रमसाश्चाऽन्यानि च पात्राणि उच्छिष्टानि न भवन्तीत्यर्थः ॥ ४६ ॥
इदानीं संक्षिप्याऽऽह—
'कालोऽग्निर्मनसश्शुद्धिरुदकाद्युपलेपनम् ।
अविज्ञातं च भूतानां षड्विधं शौचमुच्यत इति ॥ ४७ ॥
अनु०— समय का बीतना, अग्नि, मन की शुद्धि, जल तथा अन्य उसी प्रकार के द्रव, ( गोबर आदि द्वारा ) लेपन और अशुद्धि का ज्ञान न होना-इन छः प्रकारों से वस्तुओं की शुद्धि बतायी गयी है ॥ ४७ ॥
कालश्चावाशौचादौ शुद्धिसाधनं भवति । तथाऽन्यत्राऽपि तैजसानां
१. श्लोकोऽयं किञ्चिदेवान्यथयितं वासिष्ठे दृश्यते । See व० ध० २३. २७.