भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 486 में से

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पृष्ठ 123

दशमः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने पञ्चमोऽध्यायः ७१

स वै वार्धुषिको नाम सर्वधर्मेषु गर्हितः ॥ वृद्धिं च भ्रूणहत्यां च तुलया समतोलयत् । अतिष्ठद् भ्रूणहा कोटयां वार्धुषिस्समकम्पतेति ॥ २४ ॥

अनु०—इस विषय में निम्नलिखित उद्धृत करते हैं— जो अल्प वृद्धि पर धन लेकर अधिक वृद्धि पर लगाता है वह वार्धुषिक ( सूदखोर ) कहलाता है और वह सभी धर्मों में निन्दित है । ( ब्रह्मा ने ) ब्याज लेने तथा भ्रूण अर्थात् गर्भपात के पापों को एक साथ तराजू में तोला । गर्भपात करने वाला ऊपर उठ गया और सूदखोर नीचे झूलने लगा ॥ २४ ॥

टि०—धर्म शास्त्रानुसार अल्प वृद्धि ही उचित मानी गयी है । वार्धुषिक या सूदखोर उसे कहा गया है जो एक महाजन से कम ब्याज पर धन लेकर दूसरे जरूरतमन्द लोगों की कठिन स्थिति का लाभ उठाकर उसी ऋण में लिये गये धन को बहुत ऊंचे ब्याज की दर पर उधार देता है । ऐसा कर्म भ्रूणहत्या की अपेक्षा भी अधिक पापजनक और गर्हित है ।

अर्थो वृद्धिः, समित्ययमुपसर्गो गृह्यते । अनेन सम्पद्यते य एकस्य हस्ताल्लघीयस्या वृद्धया द्रव्यं गृहीत्वाऽन्यस्मै भूयस्यै प्रयच्छति स एको वार्धुषिकः । अपरस्तु परेणोपायार्जितं द्रव्यं पूर्वसूत्रोक्तात् परिमाणात् भूयस्यै प्रयच्छति । अयमर्थो द्वितीयेन यच्छब्देन लभ्यते । तत्र निन्दा—सर्वधर्मेषु गर्हित इत्यादि । यो य इति वीप्सया ब्राह्मणादन्येषां निषेधो द्रष्टव्यः ॥ २४ ॥

'गोरक्षकान् वाणिजकान् तथा कारुकुशीलवान् । प्रेष्यान् वार्धुषिकांश्चैव विप्रान् शूद्रवदाचरेत् ॥ २५ ॥

अनु०—गो आदि पशुओं के रक्षक, व्यापार करने वाले, कारीगरी का अभिनय करने वाले नट ( और चारण ) का कार्य करने वाले, सन्देशवाहक भृत्यों का काम करने वाले तथा सूदखोर ब्राह्मणों को शूद्र मानकर उनके साथ व्यवहार करे ॥ २५ ॥

टि०—इन व्यवसायों में रत ब्राह्मण यदि वेदशास्त्र का उच्च विद्वान् भी हो तो उसे शूद्रवत् समझा जायेगा । गोविन्द स्वामी के अनुसार इस सूत्र में विप्र शब्द से ब्राह्मण के अतिरिक्त क्षत्रिय और वैश्य भी अभिप्रेत है ।


१. Cf. मनु ८. १०३. गोरक्षणजीविनः, वाणिज्यजीविनः, कारुकर्मजीविनः, इत्यादि, वृद्धययाजीवो वार्धुषिकः ।