बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७४ बौधायन-धर्मसूत्रम् [स्वेच्छाचारनिन्दा
अधुना नानाविधानां पुरुषार्थानां परस्परविरोधं दर्शयित्वा हेयोपादेयविवेकायाऽऽह—
१वेदः कृषिविनाशाय कृषिर्वेदविनाशिनी ।
शक्तिमानुभयं कुर्यादशक्तस्तु कृषिं त्यजेत् ॥ ३१ ॥
**अनु०—**वेद का अध्ययन-अध्यापन कृषि कर्म को नष्ट कर देता है और कृषि कर्म वेद ज्ञान का विनाश करता है। जिस व्यक्ति में दोनों कार्य कर लेने की क्षमता हो वह दोनों करे किन्तु जिसमें दोनों कार्य करने की शक्ति न हो वह कृषि का परित्याग कर दे ॥ ३१ ॥
**टिप्पणी—**बौधायन धर्मसूत्र का दृष्टिकोण विशेषतः उल्लेखनीय है। यह उस काल की ओर संकेत करता है जब ब्राह्मण वेदाध्ययन के साथ-साथ कृषि भी करने लगे थे। किन्तु बौधायन० के विचार से दोनों कार्य करने के लिए प्रचुर साधन अपेक्षित थे और ये दोनों व्यवसाय स्वभावतः परस्पर विरोधी हैं । इनमें धर्म शास्त्रानुसार वेदाध्ययन या वेदाध्यापन का कर्म श्रेयस्कर है। मनु ने भी स्पष्ट कहा है कि उन सभी कर्मों का त्याग कर देना चाहिए जो स्वाध्याय में विघ्न उपस्थित करते हैं।
कुविवाहैः क्रियालोपैर्वेदानध्ययनेन च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्मणातिक्रमेण च ॥
शिल्पेन व्यवहारेण शूद्रापत्यैश्च केवलैः ।
गोभिरश्वैश्च यानैश्च कृष्या राजोपसेवया ॥
अयाज्ययाजनैश्चैव नास्तिक्येन च कर्मणाम् ।
कुलान्याशु विनश्यन्ति यानि हीनानि मन्त्रतः ॥
— मनु० ३ । ६३-६५
कृषिग्रहणं वेदतदर्थज्ञानविरोधप्रदर्शनार्थम् ॥ आह च मनुः—
सर्वान् परित्यजेदर्थान् स्वाध्यायस्य विरोधिनः ॥ इति ॥ ३१ ॥
वेदोत्सादनप्रसङ्गादिदमन्यदुच्यते—
न वै देवान् पीवरोऽसंयतात्मा रोरूयमाणः ककुदी समश्नुते ।
चलत्तुन्दी रभसः कामवादी कुशास इत्यणवस्तत्र यान्ति ॥ ३२ ॥
१. अत्र मनुविरुद्धे । See मनु० १०. ८३, ८४.
कृषिर्वेदविनाशाय वेदः कृषिविनाशनः । इति ई. पु.