भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 486 में से

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सभी शाखाओं का सूत्र-ग्रन्थ सभी आर्यों के लिए प्रामाणिक और मान्य होता था। कुमारिल ने पूर्वमीमांसा-सूत्र १.३.११ में इसी तथ्य का उल्लेख किया है—

"स्वशाखाविहितैश्चापि शाखान्तरगतान्विधीन् ।
कल्पकारा निबध्नन्ति सर्व एव विक्षिप्तान् ॥
सर्वशाखोपसंहारो जैमिनेश्चापि संमतः ॥"

सूत्रकारों का दृष्टिकोण उदार था और वे केवल अपनी ही शाखा तक सीमित होकर सन्तोष का अनुभव नहीं करते थे :—
'न च सूत्रकाराणामपि कश्चित् स्वशाखोपसंहारमात्रेणावस्थितः ।'

श्रौतसूत्र जहाँ बड़े यज्ञों से तथा गृह्यसूत्र घरेलू संस्कारों एवं यज्ञ-क्रियाओं से सम्बद्ध हैं, वहाँ धर्मसूत्र मानव के सम्पूर्ण जीवन का निर्धारण करने वाला अधिक व्यावहारिक साहित्य है। मानव के व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के पथ का अनुलेखन ही धर्मसूत्रों का लक्ष्य है।

कतिपय उल्लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि श्रौत एवं गृह्यसूत्रों से पहले भी धर्मसूत्र विद्यमान थे। श्रौतसूत्र में यज्ञोपवीत-धारण की विधि नहीं बतायी गयी है और इसका संकेत किया गया है कि यह विधि धर्मसूत्र से ज्ञात है। इसी प्रकार मुखशुद्धि (आचान्त) और सन्ध्यावन्दन के नियमों के ज्ञात होने का संकेत है। इनके आधार पर कुछ लोगों का मत है कि धर्मसूत्रों का अस्तित्व श्रौतसूत्रों के भी पहले था। किन्तु ये तर्क निर्बल हैं। वस्तुतः धर्मसूत्र श्रौत एवं गृह्यसूत्रों के बाद संकलित हुए हैं। हाँ, यह सम्भव हो सकता है कि कुछ प्राचीन धर्मसूत्रों के कतिपय अंशों का उद्भव श्रौतसूत्रों के साथ-साथ हुआ हो।

धर्मसूत्रों का रचनाकाल

धर्मसूत्रों की रचना के काल के सन्दर्भ में उपर्युक्त तथ्यों के विपर्यास में उनमें प्रतिबिम्बित सामाजिक स्थिति अधिक प्रामाणिक और पुष्ट प्रमाण के रूप में विश्वसनीय है। समग्र रूप में समाज के जिन पक्षों—वर्णव्यवस्था, शूद्र की स्थिति, नारी की परतन्त्रता—का जो रूप स्मृतियों में मिलता है, वही रूप धर्मसूत्रों में भी दिखायी पड़ता है।' यही नहीं, स्मृति-ग्रन्थों की वाक्यावली भी कई धर्मसूत्रों में उसी रूप में मिल जाती है।

निरुक्त के रचयिता यास्क ने ३.४.५ में सम्पत्ति के विभाजन के सम्बन्ध में पुत्री के रिक्थाधिकार का उल्लेख किया है—'अथैतां जाम्या रिक्थप्रतिषेध उदाहरन्ति ज्येष्ठं पुत्रिकाय। इत्येके।'

इस स्थल पर यास्क ने वैदिक मन्त्रों को उद्धृत किया है और एक ऐसे श्लोक का निर्देश किया है, जिससे धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों का पहले विद्यमान होना स्पष्ट है—

"तदेतदृक् श्लोकाभ्यामभ्युक्तम् ।
अङ्गादङ्गात्सम्भवसि...स जीव शरदः शतम् ॥
अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः।
मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥"

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