बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंइस प्रकार यास्क के पहले धर्मशास्त्र के ग्रन्थ विद्यमान थे। धर्मसूत्रों में प्राचीनतम धर्मसूत्र-गौतम, बौधायन एवम् आपस्तम्ब धर्मसूत्र— ६०० ई० पू० और ३०० ई० पू० के मध्य के माने जाते हैं। धर्मसूत्रों में धर्मशास्त्र और धर्मशास्त्रकारों का बहुशः उल्लेख हुआ है। उदाहरणार्थ गौतमधर्मसूत्र में निम्नलिखित सूत्र द्रष्टव्य हैं— 'तस्य च व्यवहारो वेदो धर्मशास्त्राण्यङ्गानि उपवेदाः पुराणम्।' १.९.२१ 'चत्वारश्चतुर्णां पारगा वेदानां प्रागुत्तमाश्रय आश्रमिणः पृथग्धर्मविदस्त्रय एतान्द- शावरान् परिषदित्याचक्षते।' ३.१०.४७ इसी प्रकार गौतमधर्मसूत्र मे मनु के मत का नामतः उल्लेख है— 'त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यान्मनुः'—३.३.७ कई स्थानों पर दूसरे आचार्यों के मतों का निर्देश 'एके' कहकर किया गया है, जैसे १.२.१५, २.५८, ३.१, ४.२१, ७.२३ में। 'आचार्याः' कहकर भी धर्मशास्त्रों के मत का उल्लेख किया गया है—'ऐकाश्रम्यं त्वाचार्याः प्रत्यक्षविधानाद् गार्हस्थ्यस्य।' १.३.३५ 'वर्णान्तरगमनमुत्कर्षाभ्यां सप्तमे पञ्चमे चाऽऽचार्याः।' १.४.१८ गौतमधर्मसूत्र के अतिरिक्त अन्य धर्मसूत्रों में भी धर्मशास्त्रकारों के उल्लेख किये गये हैं। पतञ्जलि ने 'धर्मशास्त्रं च तथा' एवं जैमिनि ने भी पूर्वमीमांसा ६.७.६ में 'सूत्रञ्च धर्मशास्त्रत्वात्' कहकर धर्मशास्त्रों के अस्तित्त्व का स्पष्ट संकेत किया है। इन सभी प्रमाणों पर विचार कर महामहोपाध्याय काणे ने निष्कर्ष निकाला है : “धर्मशास्त्र यास्क के पूर्व उपस्थित थे, कम-से-कम ६००-३०० के पूर्व तो वे थे ही और ईसा की द्वितीय शताब्दी में वे मानव आचार के लिए सबसे बड़े प्रमाण माने जाते थे।” "Works on the dharmasūtra existed prior to the period 600-300 B. C. and in the 2nd century B. C. they had attained a position of supreme authority in regulating the conduct of men." —हिस्ट्री ऑफ धर्मशास्त्र, पृ० ९ एक प्रश्न और विचारणीय है। सूत्रग्रन्थ प्रायः पद्यात्मक धर्मशास्त्रों से पूर्ववर्ती माने जाते हैं। प्रो० मैक्स म्यूलेर इसी विचार का प्रतिपादन करते हैं, यद्यपि वे इस प्रकार की साहित्यिक रचनाओं का भी अस्तित्त्व स्वीकार करते हैं जो सूत्रों के पहले मौखिक संक्रमण की परम्परा द्वारा प्रचलित थीं और अपौरुषेय मानी जाती थीं। ये रचनाएँ ही धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों का आधार बनीं— There existed previous to the Sūtra period, a body of literary works propagated by oral tradition, which formed the basis of all later writings on sacred subjects, and which by the Brāhmanas was believed to be of divine origin. —Ancient Sanskrit Literature, p. 95. डॉ० भण्डारकर भी यही मानते हैं कि सूत्रों की रचना के बाद अनुष्टुभ् छन्द में रचित धर्मग्रन्थों की रचना हुई। महामहोपाध्याय काणे का मत है कि चूंकि प्राचीन
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