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बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 486 में से

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ग्रन्थों के विषय में हमारा ज्ञान अल्प है, अतः पौर्वापर्य की स्पष्ट रेखा नहीं खींची जा सकती। श्लोकबद्व कुछ धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ जैसे मनुस्मृति सूत्रात्मक रचना विष्णुधर्मसूत्र से प्राचीन हैं तथा वसिष्ठधर्मसूत्र का समकालीन है।

कतिपय प्राचीन सूत्रग्रन्थ जैसे बौधायनधर्मसूत्र में भी श्लोकों के उद्धरण आये हैं जो स्पष्टतः सूत्रों से पहले श्लोकबद्ध रचनाओं का अस्तित्व प्रमाणित करते हैं।

"This renders it highly probable that works in the sloka metre existed before them. Besides, a large literature on dharma existed in the days of Āpastamba and Baudhāyana which has not come down to us." ( p. 10. )

धर्मसूत्र-साहित्य का परिचय

**गौतमधर्मसूत्र—**धर्मसूत्रों में प्राचीनतम गौतमधर्मसूत्र है। यह केवल गद्य में है तथा इसमें श्लोक का कोई उद्धरण नहीं दिया गया है, जबकि दूसरे धर्मसूत्रों में श्लोक का उद्धरण आ जाता है। इसकी प्राचीनता के कई प्रमाण हैं—इसका उल्लेख बौधायन- धर्मसूत्र में किया गया है। यह तीन प्रश्नों में विभक्त है, जिनमें क्रमशः नौ, नौ, दस अध्याय हैं। विस्तृत समालोचना के लिए चौखम्बा से प्रकाशित मेरे अनुवाद से युक्त संस्करण देखें।

**बौधायन-धर्मसूत्र—**बौधायन का धर्मसूत्र चार प्रश्नों में विभक्त है, इनमें अन्तिम प्रश्न परिशिष्ट माना जाता है और उसे बाद के समय की रचना मानते हैं। यह 'आपस्तम्बधर्मसूत्र से पहले का है। इसमें दो बार गौतम के नाम का तथा एक बार उनके धर्मसूत्र का उल्लेख आता है। बौधायन ने अनेक आचार्यों के नाम गिनाये हैं तथा उपनिषदों के उद्धरण दिये हैं। कुमारिल ने बौधायन को आपस्तम्ब के बाद के समय का माना है। बौधायन का काल ई० पू० २००-५०० के बीच माना जाता है।

**आपस्तम्ब-धर्मसूत्र—**इस धर्मसूत्र में दो प्रश्न हैं, जिनमें प्रत्येक में ११ पटल हैं। सभी सूत्रों में यह छोटा है और इसकी शैली बड़ी चुस्त है। भाषा भी पाणिनि से बहुत पहले की है। अधिकांश सूत्र गद्य में हैं, किन्तु यत्र-तत्र श्लोक भी हैं। इसका सम्बन्ध पूर्वमीमांसा से दिखायी पड़ता है। यह बहुत प्रामाणिक माना जाता रहा है। इसका समय ६००-३०० ई० पू० स्वीकार किया गया है।

**हिरण्यकेशिश्रौतसूत्र—**हिरण्यकेशिकल्प का २६वाँ और २७वाँ प्रश्न हिरण्यकेशिधर्मसूत्र कहलाता है। प्रायः इसे स्वतन्त्र धर्मसूत्र नहीं माना जाता, क्योंकि इसमें आपस्तम्ब- धर्मसूत्र से सैकड़ों सूत्र लिये गये हैं।

**वसिष्ठ-धर्मसूत्र—**इसके कई संस्करण हैं। जीवानन्द के संस्करण में २० अध्याय हैं तथा ३१वें अध्याय का कुछ अंश है। इसके अतिरिक्त ३० अध्यायों, ६ अध्यायों एवं २१ अध्यायों के अलग-अलग संस्करण भी हैं। इससे पता चलता है कि यह कालान्तर में परिवृंहित, परिवर्द्धित और परिवर्तित होता रहा है। इसका समय ३००-२०० ई० पू० है।

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