भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 486 में से

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विष्णु-धर्मसूत्र—इस सूत्र में १०० अध्याय हैं, किन्तु सूत्र छोटे हैं। पहला अध्याय और अन्त के दो अध्याय पद्य में हैं। शेष में गद्य है या पद्य का मिश्रण। इसका सम्बन्ध यजुर्वेद की कठ शाखा से बताया गया है। इसमें भिन्न-भिन्न कालों के अंश दृष्टिगोचर होते हैं, जिससे इसका काल निश्चित करना कठिन है। इसके आरम्भ के अंशों का समय ३००-१०० ई० पू० के बीच माना जा सकता है। इसमें भगवद्गीता, मनुस्मृति तथा याज्ञवल्क्यस्मृति से बहुत सी बातें ली गयी हैं।

हारीत-धर्मसूत्र—इस सूत्र का ज्ञान उद्धरणों से मिलता है। अनेक धर्मशास्त्रकारों ने इसका उल्लेख किया है। इसमें गद्य के अनुष्टुप् एवं त्रिष्टुप् छन्द का प्रयोग है। हारीत का सम्बन्ध कृष्णयजुर्वेद से है, किन्तु उन्होंने सभी वेदों से उद्धरण लिये हैं। इससे यह भी ज्ञात होता है कि वे किसी एक वेद से सम्बद्ध नहीं थे।

शङ्खलिखित-धर्मसूत्र—यह शुक्लयजुर्वेद की वाजसनेयिशाखा का धर्मसूत्र था। ‘तन्त्र-वार्तिक’ में इस सूत्र के अनुष्टुप् श्लोकों का उद्धरण है। याज्ञवल्क्य और पाराशर ने इनका उल्लेख किया है। जीवानन्द के स्मृति-संग्रह में इस धर्मसूत्र के १८ अध्याय एवं शङ्खस्मृति के ३३० तथा लिखित-स्मृति के ९३ श्लोक पाये जाते हैं। यह धर्मसूत्र गौतम एवं आपस्तम्ब के बाद के काल का है और इसकी रचना का समय ई० पू० ३०० से १०० ई० के बीच है।

अन्य सूत्र ग्रन्थ—अनेक धर्मसूत्र धर्मविषयक ग्रन्थों में विकीर्ण हैं। उनमें इन आचार्यों के सूत्र-ग्रन्थ गिनाये जाते हैं—अत्रि, उशना, कण्व एवं काण्व, कश्यप एवं काश्यप, गार्ग्य, च्यवन, जातूकर्ण्य, देवल, पैठीनसि, बुध, बृहस्पति, भरद्वाज एवं भारद्वाज, शातातप, सुमन्तु आदि।

•धर्मसूत्रों का प्रतिपाद्य

धर्मसूत्रों का मुख्य विषय व्यक्ति के जीवन के आचार एवं कर्त्तव्य हैं। धर्मसूत्र मुख्यतः वर्णों एवम् आश्रमों के नियमों का विवेचन करते हैं तथा उच्चवर्णों के दैनिक धर्मकृत्यों का विधान करते हैं। सुतरां, धर्मसूत्र कभी-कभी गृह्यसूत्रों द्वारा प्रतिपाद्य विषयों के क्षेत्र में भी पहुँच जाते हैं। गृह्यसूत्रों का ध्येय गृह्ययज्ञ, प्रातः-सायं-पूजन, पाकयज्ञ, विवाह, पुंसवन, जातकर्म, उपनयन एवं दूसरे संस्कार, ब्रह्मचारी एवं स्नातक के नियम, मधुपर्क और श्राद्धकर्म का वर्णन करना तथा इनसे संबद्ध नियमों को स्पष्ट करना है। इस प्रकार गृह्यसूत्रों के विषय नितान्त वैयक्तिक जीवन से सम्बद्ध हैं। उनमें व्यक्ति के सामाजिक दायित्वों एवं कानून का विवेचन नहीं है। इसके विपरीत, धर्मसूत्र मनुष्य को समाज में लाकर खड़ा कर देता है, जहाँ उसे व्यावहारिक जगत् में दूसरों के साथ रहते हुए अपने आचार-व्यवहार को नियमित और संयमित करना है, उसे कुछ कर्त्तव्यों एवं दायित्वों का पालन करना होता है, कुछ अधिकार प्राप्त करने होते हैं और अपने अपराधों के लिए दण्ड भोगने होते हैं, इस प्रकार धर्मसूत्रों का वातावरण अधिक सामाजिक और नैतिक है। जैसा हम कह आये हैं, धर्मसूत्रों में गृह्यसूत्रों के कुछ विषयों पर भी विचार किया गया है, जैसे, विवाह, संस्कार, मधुपर्क, स्नातक का जीवन, श्राद्धकर्म आदि। संक्षेप में धर्मसूत्रों के वर्ण्य-विषय की सूची इस प्रकार दी जा सकती

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