भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 486 में से

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पृष्ठ 138
८६बौधायन-धर्मसूत्रम्[ आशौचविधिः

दृष्ट्वा वासतीवरे कलशे रेतो न्यपतत् । ततोऽगस्त्यवसिष्ठावजायेतामिति । तदेतदृचाऽभ्युक्तम्— 'उताऽसि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्मनसोऽधिजातः । द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन विश्वे देवाः पुष्करे त्वाददन्त ॥ इति ॥ २० ॥ अतस्स्वमतमेवोपसंहरति—

मातापित्रोरेव तु संसर्गसामान्यात् ॥ २१ ॥

अनु०— किन्तु अन्तिम मत यही है कि माता और पिता दोनों के लिये आशौच होना चाहिए, क्योंकि सन्तानोत्पत्ति में दोनों का समान संसर्ग होता है ॥ २१ ॥

संसर्गः सम्बन्धः प्रजोत्पत्त्युपायभूतः । स चोभयोस्समानो यस्मात् ॥२१॥

अधुना क्रमप्राप्ते मरणे सत्युदकक्रियाप्रयोगक्लृप्तिरुच्यते—

मरणे तु यथाबालं पुरस्कृत्य यज्ञोपवीतान्यपसव्यानि कृत्वा तीर्थमवतीर्य सकृत्सकृत् त्रिर्निमज्ज्योत्तीर्याऽऽचम्य तत्प्रत्ययमुदकमासिञ्चाऽत एवोत्तीर्याऽऽचम्य गृहद्वार्यङ्गारमुदकमिति संस्पृश्याऽक्षारलवणाशिनो दशा॒हं कटमासीरन् ॥ २२ ॥

अनु०— मृत्यु के समय मृत के सम्बन्धी अवस्था के अनुसार कम आयु वालों को आगे कर, यज्ञोपवीत को दाहिने कन्धे के ऊपर (तथा बायीं भुजा के नीचे) कर, घाट पर जल में उतरें। एक-एक कर तीन बार डुबकी लगायें, जल से निकल कर आचमन करें और मृत व्यक्ति को उद्दिष्ट कर जल प्रदान करें। फिर किनारे पर आकर आचमन करें, अपने घर के द्वार पर अङ्गार, जल आदि इसी प्रकार की वस्तु का स्पर्श कर दश दिन तक क्षार, नमक आदि का भोजन न करते हुए चटाई पर सोयें ॥ २२ ॥

टि०— 'सकृत् सकृत्' से यह तात्पर्य है कि जल में डुबकी लगाने, जल से निकलने


१. अयमर्थ एतत्प्रोपरितनमन्त्रेणाऽपि स्पष्टं प्रतिपाद्यते—
सत्रे ह जाता विषिता नमोभिः कुम्भे रेतस्सिषिचतुस्समानम् ।
ततो ह मान उदियाय मध्यात्ततो जातपृषिमाहुर्वसिष्ठम् ॥
ऋ. सं. ५. ३. २४. ३.

ज्योतिष्टोमादिषु सोमयागेषु अभिषवकाले आसेचनार्थं अभिषुतस्य सोमरसस्याऽल्पत्वात् तेन सह मेलनार्थं च नद्यादितीर्थेभ्य आहृत्य कुम्भेषु आपस्संरक्ष्यन्ते । ता वसतीवर्य इत्युच्यन्ते । यत्र तास्सन्ति स कुम्भो वासतीवरः ॥ मानः अगस्त्यः ।