बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्रयोदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने षष्ठोऽध्यायः १०५
अनु०--भूमि चार प्रकार से शुद्ध होती है-गायों के पैर पड़ने, खोदने, आग जलाने तथा वर्षा होने से ॥ १९ ॥
अत्यन्तोपहताया भूमेरेतच्छौचम् । तत्र वेदिविमानकाले सन्निकर्षविप्रक- र्षापेक्षयोपघातविशेषापेक्षया चाऽभिवर्षणादीनां व्यस्तसमस्तकल्पना ॥ १९ ॥
अथेदानौमत्यन्तोपहताया आह—
पञ्चमाच्चोपलेपनात् षष्ठात्कालात् ॥ २० ॥
अनु०--पांचवे, गाय के गोबर से लीपने से तथा छठे, समय बीतने से स्वतः भूमि की शुद्धि होती है ॥ २० ॥
उपलेपनमुक्तम् । सोमसूर्यांशुमारुतैर्या शुद्धिः सा कालात् शुद्धिः ॥ २० ॥
असंस्कृतायां भूमौ न्यस्तानां तृणानां प्रक्षालनम् ॥ २१ ॥
अनु०--( जल आदि को छिड़क कर ) शुद्ध न की गयी भूमि पर रखे गये कुशादि तृणों को धोना चाहिए ॥ २१ ॥
¹प्रोक्षणादिसंस्कारविहीनायां भूमौ न्यस्तानामत्यन्ताल्पानां तृणानां बर्हि- रादीनां प्रक्षालनं कार्यम् ॥ २१ ॥
परोक्षोपहतानामभ्युक्षणम् ॥ २२ ॥
अनु०--परोक्ष में अशुद्ध हुए कुशादि तृणों पर जल छिड़कना चाहिए ॥ २२ ॥
तृणानामेव यज्ञार्थं समुपहतानामेतत्² ॥ २२ ॥
एवं क्षुद्रसमिधाम् ॥ २३ ॥
अनु०--इसी प्रकार इन्धन के छोटे-छोटे टुकड़ों को भी इसी विधि से शुद्ध करना चाहिए ॥ २३ ॥
क्षुद्रसमिधोऽङ्गुलिपरिमितः अनिध्मा इति यावत् ॥ २३ ॥
महतां काष्ठानापमुपघाते प्रक्षाल्याऽवशोषणम् ॥ २४ ॥
अनु०—लकड़ी के बड़े टुकड़ों के दूषित होने पर उन्हें धोकर सुखाने से शुद्धि होती है ॥ २४ ॥
टि०—गोविन्द स्वामी के अनुसार यज्ञोपयोगी लकड़ी के विषय में ही यह नियम है ।
१. उपलेपादीनामन्यतमेनासंस्कृतायाम् ग. पु. । २. शूद्रोपहतानामिति ग. पु. ।