भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१०६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ द्रव्यशुद्धिः

याज्ञिकानामेव काष्ठानां 'अथाऽभ्यादधातीध्मं प्रणयनीम्, औदुम्बरान् महापरिधीन्' इत्येवमादावुपयोक्तव्यानां पादादिभिरुपहतानामेतत् ॥ २४ ॥

बहूनां तु प्रोक्षणम् ॥ २५ ॥

अनु०—किन्तु लकड़ी के टुकड़ों का ढेरी पर जल छिड़क देने से ही शुद्धि होती है ॥ २५ ॥

टि०--'तेषामेव मूत्राद्युपघाते त्याग एव' मूत्रादि से दूषित होने पर उनका भी त्याग कर देना चाहिए।

इध्मादिव्यतिरिक्तानां पूर्वस्मिन् विषये प्रोक्षणं तद्वद्बहुत्वे। तेषामेव मूत्राद्युपघाते त्याग एव ॥ २५ ॥

दारुमयानां पात्राणामुच्छिष्टसमन्वारब्धानांमवलेखनम् ॥ २६ ॥

अनु०—काष्ठ के पात्रों के अपवित्र व्यक्तियों द्वारा छू लिये जाने पर उनको घिसने-रगड़ने से ही शुद्धि होती है ॥ २६ ॥

जुह्वादीनामुच्छिष्टपुरुषस्पृष्टानां दार्वादीनामवलेखनं घर्षणम्। अशुचिभिः समन्वारम्भः स्पर्शः। 'चमूर्णां स्रुक्स्रुवाणां च'इति मानवमपूर्वं वेदितव्यम्॥२६॥

उच्छिष्टलेपोपहतानामवतक्षणम् ॥ २७ ॥

अनु०—यदि काष्ठपात्र उच्छिष्ट से दूषित हो गये हों तो उसे बसुला आदि से खुरचने या गढ़ने पर शुद्धि होती है ॥ २७ ॥

तेषामेवाऽस्मिन्निमित्ते अवतक्षणं वाश्यादिनाऽयस्मयेनाऽनुकर्षणं तस्मिन् कृतेऽपि तत्पात्रं यदि स्वकार्यक्षम भवति। अक्षमस्य तु श्रौतेनोपायेन त्याग एव ॥ २७ ॥

मूत्रपुरीषलोहितरेतःप्रभृत्युपहतानामुत्सर्गः ॥ २८ ॥

अनु०—मूत्र, मल, रक्त, रेतस् आदि अमेध्य वस्तुओं से अपवित्र हुए (काष्ठ-पात्रों) का त्याग कर देना चाहिए ॥ २८ ॥

टिप्पणी—गोविन्द के अनुसार इन अमेध्य वस्तुओं से दूषित कुश, ईंधन आदि का भी त्याग कर देना चाहिए।

इध्माबर्हिरादीनामप्ययं विधिर्द्रष्टव्यः। प्रभृतिशब्देनाऽत्र निर्दिष्ठानां द्वाद-शमळानां ग्रहणं कृतम् ॥ २८ ॥

'दारुमयानाम्' इत्यादिसूत्रद्वयस्याऽपवादमुपक्रमते—

तदेतदन्यत्र निर्देशाद् ॥ २९ ॥