बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चदशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने सप्तमोऽध्यायः ११९
१'नाऽप्रोक्षितमप्रपन्नं क्लिन्नं काष्ठं समिधं वाऽभ्यादध्यात् ॥
अनु०—( अग्नि पर ) ऐसी लकड़ी या समिध् न रखे जिस पर जल न छिड़का गया हो, जो तैयार न किया गया हो और गीला हो ॥ २० ॥
अग्नाविति शेषः । क्लिन्नमार्द्रम् ॥ २० ॥
अग्रेणाऽऽहवनीयं ब्रह्मयजमानौ प्रपद्येते ॥ २१ ॥
अनु०—ब्रह्मन् और यजमान आहवनीय अग्नि के आगे से वेदि के निकट आएं ॥ २१ ॥
दक्षिणत आसितुम् । अग्रेणेति 'एनबन्यतरस्यामदूरेऽपञ्चम्याः, 'एनपा द्वितीया' इति चाऽनुशासनात् ॥ २१ ॥
जघनेनाऽऽहवनीयमित्येके ॥ २२ ॥
अनु०—कुछ आचार्यों का मत है कि वे आहवनीय अग्नि के पीछे से प्रवेश करें ॥ २२ ॥
एके आचार्या मन्यन्ते वेदिमविलङ्घ्याऽपि ॥ २२ ॥
दक्षिणेनाऽऽहवनीयं ब्रह्मा २यतनमपरेण यजमानस्य ॥
अनु०—आहवनीय अग्नि के दक्षिण की ओर ब्रह्मा का स्थान होता है और उससे पश्चिम यजमान का ॥ २३ ॥
समान्येतानि कुर्यात् । 'प्रणीताहवनीयं ब्रह्मायतनम्' इति सिद्धे यजमानायतनविधानार्थ आरम्भः । अतश्च 'यजमानायतन उपविश्य, यजमानायतने तिष्ठन्' इत्येवमादिषु संव्यवहारेषु अस्मिन्नेव देश संप्रत्ययस्सिद्धो भवति ॥२३॥
उत्तरां श्रोणिमुत्तरेण होतुः ॥ २४ ॥
अनु०—होता का स्थान वेदि की उत्तर-दिशा की श्रोणि से उत्तर की ओर होता है ॥ २४ ॥
आयतनमिति शेषः । वेदेरुत्तरापरदेश इत्यर्थः ॥ २४ ॥
उत्कर आग्नीध्रस्य ॥ २५ ॥
अनु०—आग्नीध्र का स्थान उत्कर के समीप होता है ॥ २५ ॥
१. cf. आपस्तम्बधर्मसूत्र १.१५.१२. २. ब्रह्मयजमानौ प्रपद्येते तमपरेण इति. ग. पु.