बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशः खण्डः ] प्रथमप्रश्ने दशमोऽध्यायः १३७
सुकृतं धर्मः। स च सुष्ठु कृतो यथाविध्यनुष्ठितः। यमनृतेन पराजयसि तद्गामी त्वदीयो धर्म इति याज्ञवल्क्योऽभिप्रैति—
सुकृतं यत्त्वया किञ्चिज्जन्मान्तरशतैः कृतम् ।
तत्सर्वं तस्य जानीहि पराजयसि यं मृषा ॥
इत्यवदत् ॥ १२ ॥
किञ्च—
त्रीनेव च पितॄन् हन्ति त्रीनेव च पितामहान् ॥ १३ ॥
अनृतवदनमात्रे एष दोषः ॥ १३ ॥
साक्ष्यनृते तु —
सप्त जातानजातांश्च साक्षी साक्ष्यं मृषा वदन् ॥ १४ ॥
**अनु०—**अपने तीनों पिता को, अपने तीन पितामहों को, अपने से पहले उत्पन्न तथा अपने बाद उत्पन्न होने वाले सात-पीढ़ी के पुरुषों को झूठी गवाही देने वाला साक्षी मार डालता है ॥ १३-१४ ॥
स आत्मनः पूर्वापरान् सप्तसप्त हन्तीत्यर्थः। अधर्मप्रवणचित्तानां मत्याऽऽत्मीयवंश्यहननोपाये वैराग्यं भवतोत्येवं सान्त्वनम् ॥ १४ ॥
अथेदानीं विप्रतिपत्तिविषयभूतदृष्टविशेषापेक्षयाऽनृतवदने दोषमाह—
हिरण्यार्थेऽनृते हन्ति त्रीनेव च पितामहान् ।
पञ्च पश्वनृते हन्ति दश हन्ति गवानृते ॥
शतमश्वानृते हन्ति सहस्रं पुरुषानृते ।
सर्वं भूम्यनृते हन्ति साक्षो साक्ष्यं मृषा वदन् ॥ १५ ॥
**अनु०—**स्वर्ण के लिए झूठ बोलने पर साक्षी तीन पूर्वजों को नष्ट करता है, पशु के विषय में असत्य बोलकर पाँच और गाय के विषय में असत्य बोलकर दश का, घोड़े के संबंध में असत्य बोलने पर सौ का वध करता है। पुरुष के विषय में असत्य भाषण कर हजार का वध करता है, झूठी गवाही देने वाला साक्षी भूमि के विषय में असत्य बोलकर सम्पूर्ण का वध कर देता है ॥ १५ ॥
**टि०—**वध करने का भाव हरदत्त ने गौतम धर्मसूत्र २-४-१४ की व्याख्या में इस प्रकार किया है "तेषां (दशानां) वधे. यावान्दोषः तावानस्य भवतीति" । (दस) के वध के बराबर दोष होता है, अर्थात् जिसके विषय में असत्य भाषण किया गया हो उसका दस संख्या में वध करने का दोष होता है। इस प्रकार उपर्युक्त सूत्र का