भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 190
१३८बौधायन-धर्मसूत्रम्प्रथम

भाव होगा, पशु के विषय में असत्य भाषण से पांच पशु के वध का दोष, गाय के विषय में असत्यभाषण से दस गाय के वध का दोष, अश्व के विषय में असत्यभाषण का सौ अश्व के वध का दोष, पुरुष के विषय में असत्यभाषण का हज़ार पुरुष के वध का दोष तथा भूमि के विषय में असत्य भाषण से सम्पूर्ण प्राणियों के वध का दोष होता है। द्रष्टव्य गौतम० वही, सूत्र ११४-१५ "क्षुद्रपश्वनृते साक्षी दश हन्ति। गोऽश्वपुरुषभूमिषु दशगुणोत्तरान् सर्वं वा भूमौ" तथा इन सूत्रों पर हरदत्त की मिताक्षरा; मेरे अनुवाद सहित चौखम्बा संस्करण, पृ० १३५।

अत्र हिरण्यशब्दो रजतादिवचनः।
हन्ति जातानजातांश्च हिरण्यार्थेऽनृतं वदन् ॥
इति सुवर्णविषये मानवदर्शनात् ॥ १५ ॥

अथ साक्षिलक्षणमाह—
चत्वारो वर्णाः पुत्रिणः साक्षिणस्स्युरन्यत्र श्रोत्रियराजन्यप्रव्रजितमानुष्यहीनेभ्यः ॥ १६ ॥

**अनु०—**श्रोत्रिय, राजा, संन्यासी, बन्धु-बान्धवहीन को छोड़कर सभी चारो वर्णों के लोग, जो पुत्र वाले हों, साक्षी हो सकते हैं ॥ १६ ॥

टि०—'मानुष्यहीन' का अनुवाद ब्यूह्लर ने 'मानव बुद्धि से हीन' किया है।

मानुष्यहीनो बन्धुहीनः। एते श्रोत्रियराजन्यप्रव्रजिताः वचनादसाक्षिणः। बन्धुहीनस्तु दृष्टदोषात्। तथा च नारदः—
वचनाद्दोषतो भेदाः स्वयमुक्तिर्मृषान्तरः।
श्रोत्रियाद्या अवचनात्ते न स्युर्दोषदर्शनात् ॥ इत्यादि ॥ १६ ॥

साक्षिद्वैधे सति राज्ञा तत्पुरुषैश्च किं कर्तव्यमित्याह—
स्मृतौ प्रधानतः प्रतिपत्तिः ॥ १७ ॥

अनु०— (विवाद-विषय के ) स्मृतियुक्त दो साक्षी होने पर प्रधान साक्षी के वचन से निश्चय होता है ॥ १७ ॥

टि०— 'स्मृतौ' की स्पष्टतः व्याख्या गोविन्द स्वामी ने नहीं की है। उनके विचार से तथ्य का स्मरण करने वाले दो साक्षियों से यहाँ तात्पर्य है। जब दो साक्षी हों तो राजा को उस साक्षी के वचन के अनुसार निश्चय करना चाहिए जो तपस्या, विद्या आदि में प्रधान हो। इस सन्दर्भ में गोविन्द स्वामी ने मनु के वचन को भी उद्धृत किया है। ब्यूह्लर ने इस सूत्र का जो अनुवाद किया है उसका भावार्थ इस