भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 486 में से

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पृष्ठ 20

'श्रुतिः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः। सम्यक् संकल्पजः कामो धर्ममूलमिदं स्मृतम्॥' १.७

इस प्रकार धर्म के उपादान, स्रोत, मूल या प्रमाण स्वयं धर्मशास्त्रों की दृष्टि में ये हैं : १. वेद, २. वेद से भिन्न परम्परागत ज्ञान अर्थात् स्मृति, ३. श्रेष्ठ लोगों के आचार-विचार, ४. अपनी विवेक बुद्धि से स्वयं को हितकर लगने वाला आचरण और उचित संकल्प से उत्पन्न इच्छा।

वेद और धर्मशास्त्रों पर दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्मशास्त्रों में जो कुछ भी कहा गया है उसका आधार वेद ही है और वेद की मान्यताओं के अनुसार ही धर्मसूत्रों के नियमों की रचना हुई। वेद की संहिताओं में और ब्राह्मण ग्रन्थों में धर्मसूत्र के विषयों का प्रसंगतः उल्लेख प्रचुर मात्रा में मिलता है, जैसे विवाह, उत्तराधिकार, श्राद्ध, स्त्री की स्थिति आदि। संहिताओं और ब्राह्मणों में जिस समाज और सभ्यता का दर्शन होता है वह धर्मशास्त्र की व्यवस्थाओं की व्यावहारिक पृष्ठभूमि है। आख्यानों में भी नियमों का पोषण हुआ दिखायी पड़ता है, जिनका उपदेश धर्मशास्त्रों ने दिया है। ब्रह्मचर्य का महत्त्व, उत्तराधिकार और सम्पत्ति का विभाजन, यज्ञ और अतिथि-सत्कार ऐसे ही विषय हैं, जिन पर धर्मसूत्रों से पूर्ववर्ती वैदिक साहित्य में भी अनेक स्थलों पर विचार हुआ है। जैसा कि म० म० काणे ने कहा है : 'कालान्तर में धर्मशास्त्रों में जो विधियाँ बतलायी गयीं, उनका मूल वैदिक साहित्य में अक्षुण्ण रूप में पाया जाता है। धर्मशास्त्रों ने वेद को जो धर्म का मूल कहा है वह उचित ही है। —धर्मशास्त्र का इतिहास, पृ० ७, अनु० काश्यप।

धर्मसूत्रों में धर्म तथा आचार

भारतीय धर्म अपनी अनेक विशेषताओं के कारण अध्ययन का आकर्षक विषय बना रहा है। भारतीय विद्वानों के अतिरिक्त विदेशी विद्वानों ने भी हिन्दू धर्म को समझने और समझाने का प्रयत्न किया। कतिपय योरोपीय विद्वानों ने इसके श्रेष्ठ तत्त्वों की उपेक्षा कर केवल आलोचना ही अपना लक्ष्य बनाया है। धर्मसूत्रों में धर्म का जो स्वरूप उभरता है उसे किसी एक विशेष शब्द द्वारा व्यक्त करना कठिन है। जॉन मेकेंजी का यह कथन सर्वथा संगत है कि हिन्दू धर्म के अन्तर्गत 'रिलीजन,' 'वर्च्यू,' 'लॉ,' और 'ड्यूटी' इन चार शब्दों का अर्थ समाहित है—

“In India in those days no clear distinction was drawn between moral and religious duty, usage, customary observance and law and dharma was the term which was applied to the whole complex forms of conduct that were settled or established.”

इस प्रकार धर्म के अन्तर्गत ईश्वर के प्रति आस्था, सदाचार, सामाजिक तथा वैयक्तिक कानून एवं कर्त्तव्य सभी आ जाते हैं। हिन्दू-धर्म की यह विशेषता है कि वह जीवन के सभी पक्षों को समन्वित रूप में देखता है।

उसका कोई भी पक्ष एक दूसरे से पृथक् नहीं किया जा सकता है। पारलौकिक, लौकिक से सम्बद्ध है और चिन्तन व्यवहार के साथ चलता है। चार पुरुषार्थों की

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