भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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कल्पना जीवन के सभी पक्षों के समन्वय का आदर्श रूप है। ये सभी पुरुषार्थ परस्पर समन्वित होकर ही धर्म के उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। हिन्दू-धर्म कोरा आदर्शवादी नहीं है। वह व्यवहार के धरातल पर स्थित है और यथार्थवादी है। धर्म मनुष्य से भिन्न नहीं है, अपितु धर्म उस प्रकार का आचरण और जीवन है जो मनुष्य को मनुष्य बनाता है। इस धर्म के अभाव में मनुष्य पशु से भिन्न नहीं रह जाता। अतएव धर्म मनुष्य को पशु से भिन्न करने वाली योग्यता है और इसका सम्बन्ध सम्पूर्ण व्यक्तित्व से है। व्यक्ति के जीवन, आचरण तथा छोटे-छोटे कार्य भी इस धर्म के क्षेत्र से बाहर नहीं रखे गये हैं।

धर्मसूत्र मनुष्य को सम्पूर्ण रूप में देखता है। मनुष्य की प्रत्येक अवस्था और प्रत्येक स्थिति के आचरण का विधान करता है। सुख-दुःख और सम्पत्ति-विपत्ति सभी पर धर्मसूत्र की दृष्टि है और वह व्यक्ति के सामाजिक, पारिवारिक, वैयक्तिक और पारलौकिक सभी पक्षों पर सूक्ष्म विचार करता है। वह व्यक्ति के जीवन की एक ऐसी दिशा निर्धारित करता है जिस पर चल कर वह आत्मा का और समाज का सम्मान प्राप्त कर सकता है। इसके लिए हिन्दू-धर्म ने सम्पूर्ण जीवन को संस्कारों में बाँध रखा है। प्रत्येक संस्कार व्यक्ति को कर्त्तव्यों की दिशा में आगे बढ़ाता है और जीवन के लक्ष्यों की ओर उन्मुख करता है। ये सभी संस्कार मनुष्य को जीवन की पवित्रता, महान् उपयोगिता और गरिमा का पाठ पढ़ाते रहते हैं। आश्रमों की व्यवस्था भी मनुष्य के जीवन की विविध अवस्थाओं के बदलते परिवेश के साथ समायोजन के लिए और उत्तरोत्तर लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित करती है। मनुष्य की शक्तियाँ परिवर्तनशील हैं और उसके अनुसार दायित्व और कर्त्तव्य भी परिवर्तित होने चाहिए। हिन्दू-धर्म में आश्रम-व्यवस्था इसी व्यावहारिक आवश्यकता की पूर्ति है और इसके साथ धर्म के महत्तर उद्देश्य की दिशा में एक प्रशस्त पथ तो है ही।

हिन्दू-धर्म का मनुष्य के जीवन के साथ जो स्पष्ट तादात्म्य है उसने पाश्चात्य विद्वानों और धर्म के चिन्तकों को भी प्रभावित किया है। यथा प्रो० मैक्स म्यूलर ने भारतीय धर्म की इस विशेषता को ध्यान में रखते हुए अपने विचार इन शब्दों में व्यक्त किये हैं—

'प्राचीन भारतवासियों के लिए सबसे पहले धर्म अनेक विषयों के बीच एक रुचि का विषय नहीं था, यह सबका आत्मार्पण करने वाली रुचि था। इसके अन्तर्गत न केवल पूजा और प्रार्थना आती थी, अपितु वह सब भी आता था जिसे हम दर्शन, नैतिकता, और कानून और शासन कहते हैं—सभी धर्म से व्याप्त थे। उनका सम्पूर्ण जीवन उनके लिए एक धर्म था और दूसरी चीजें मानों इस जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए निर्मित मात्र थीं।' —ह्वाट कैन इण्डिया टीच अस, पृ० १०७ ।

धर्म की रक्षा करने से ही मनुष्य के भौतिक एवं पारलौकिक जीवन की रक्षा होती है। धर्महीन जीवन अस्तव्यस्त, उच्छृङ्खल तथा उद्देश्यहीन होता है। धर्म लौकिक जीवन की समृद्धि एवं कल्याण के साथ-साथ परलोक की मंगल कामना भी पूरी करता है। परलोक की यह स्पृहा कल्पना की तरंग में बहते हुए कवि का स्वप्न नहीं है,

२ बौ० भू०