भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 200, कुल 486 में से

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पृष्ठ 200
१४८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ अनध्यायः

पितुर्युपरते त्रिरात्रम् ॥ १४ ॥

अनु०--पिता की मृत्यु होने पर तीन दिन का अनध्याय होता है ॥ १४ ॥
टि०--यह नियम गुरुकुल में अध्ययन करने वाले ब्रह्मचारी के लिए है और यहाँ पिता से तात्पर्य है उपाध्याय से, क्योंकि उपाध्याय को वेद प्रदान करने के कारण पिता ही कहा जाता है। साक्षात् पिता की मृत्यु पर शुद्धिपर्यन्त द्वादश दिन का अनध्याय करना होता है। गोविन्दस्वामी।

उपरते मृते। अनध्याय इत्यनुवर्तते। असमावृत्तस्याऽयम्। समावृत्तस्य त्वशुचिमात्रादेवाऽनध्यायः प्राप्तः। अत्रोपाध्यायमेव वेदप्रदानात् पितेत्याह। साक्षात्पितरि द्वादशाहविधानात्—'मातरि पितर्याचार्य इति द्वादशाहः' १। इति ॥ १४ ॥

कथमयमपि पितेति चेत्तदाह—

'द्वयमु ह वै सुश्रवसोऽनूचानस्य रेतो ब्राह्मणस्योर्ध्वं नाभेर्-
धस्तादन्यत् स यदूर्ध्वं नाभेस्तेन हैतत् प्रजायते यद्ब्राह्मणानुपिनयति
यदध्यापयति यद्याजयति यत्साधु करोति सर्वाऽस्यैषा प्रजा भवति।
अथ यदवाचीनं नाभेस्तेन हास्यौरसी प्रजा भवति तस्माच्छ्रोत्रियम-
नूचानमप्रजोऽसीति न वदन्ति ॥ १५ ॥

अनु०--क्रमपूर्वक वेदाध्ययन करने वाले विद्वान् ब्राह्मण का वीर्य दो प्रकार का होता है—नाभि से ऊपर के भाग में विद्यमान रहने वाला तथा उससे नीचे रहने वाला। नाभि से ऊपर विद्यमान वीर्य से उसके पुत्र होते हैं जिन ब्राह्मणों का वह उपनयन करता है, अध्यापन करता है, यज्ञ कराता है तथा जिन्हें पवित्र बनाता है—ये सभी उसकी सन्तान होते हैं। जो वीर्य नाभि से नीचे होता है उससे शरीर से उत्पन्न होने वाले पुत्र होते हैं। इस कारण वेद के विद्वान् से यह नहीं कहा जाता है कि तुम निःसन्तान हो।

टि०--अनूचान वह है जो वेद का अर्थसहित तथा अंगोंसहित अध्ययन करता है। नाभि के ऊपर विद्यमान रहने वाला वीर्य प्राणवायु है जो मुख में अनेक प्रकार के शब्दों का अभिव्यंजक होता है। इसके द्वारा चार प्रकार के पुत्र होते हैं—जिनका उपनयन करता है, जिनका अध्यापन करता है, जिनका यज्ञ करता है और जिन्हें पवित्र करता है। यही प्रजाओं का श्रेष्ठ जन्म है। इस विषय में आपस्तम्ब का


१. cf. वासिष्ठ ध. २.७–१०