भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 210
१५८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ प्रायश्चित्तम्

मारिए। राजा उस मूसल से उस पर प्रहार करे, मृत्यु हो जाने पर उस पाप से मुक्ति हो जाती है ॥ १५ ॥

ब्राह्मणस्वर्णं हरति बलेन वञ्चनया चौर्येण वा यो ब्राह्मणः स स्तेन इति गीयते । तस्यैतत्प्रायश्चित्तम्—प्रकीर्य केशानित्यादि । सैध्रको दृढदारुनिर्मितः । सैध्रकं मुसलं स्कन्धेनाऽऽदाय राजानं गच्छेदिति सम्बन्धः ॥ १५ ॥

अथेदानीं स्तेनशासनमपि राज्ञ ¹आवश्यकमित्येतत्प्रदर्शयितुं तदशासने दोषमाह—

अथाऽप्युदाहरन्ति—

स्कन्धेनाऽऽदाय मुसलं स्तेनो राजानमन्वियात् ।
अनेन शाधि मां राजन् क्षत्रधर्ममनुस्मरन् ॥
शासने वा विसर्गे वा स्तेनो मुच्येत किल्बिषात् ।
अशासनात्तु तद्राजा स्तेनादाप्नोति किल्विषमिति ॥ १६ ॥

**अनु०—**धर्मशास्त्रज्ञ इस सम्बन्ध में निम्नलिखित पद्य उद्धृत करते हैं—
चोर कन्धे पर मूसल लेकर राजा के समीप जाय और कहे कि हे राजन्, क्षत्रिय के धर्म का स्मरण कर इससे मुझे दण्ड दीजिए। यदि राजा उसे दण्ड दे या छोड़ दे तो वह पाप से मुक्त हो जाता है। किन्तु यदि राजा दण्ड न दे तो वह पाप राजा के ऊपर ही पहुंच जाता है ॥ १६ ॥

**टि०—**द्रष्टव्य मनु० ७।११५-१३६ ।
शासनं वधः । विसर्गो मोक्षः । किल्विषं पापम् ॥ १६ ॥


सुरां पीत्वोष्णया कायं दहेत् ॥ १७ ॥

**अनु०—**सुरा पीने पर उसी प्रकार की खोलती हुई सुरा का पान कर शरीर को जलावे ॥ १७ ॥

**टि०—**जानबूझ कर सुरापान करने पर मृत्यु होने पर ही पाप से मुक्ति होती है।

यज्जातीयस्य या सुरा प्रतिषिद्धा तयैवोष्णया अग्निवर्णया पीतया कायं दहेत् । ब्राह्मणस्य सर्वा प्रतिषिद्धा । अत एव हि सर्वां सुरां समतयैवैकत्वेन निदर्शयति—

सुरां पीत्वा द्विजो मोहादग्निवर्णां सुरां पिबेत् ॥ इति ॥

मरणांन्तिकमेतन्मतिपूर्वके ॥ १७ ॥


अमत्या पाने कृच्छ्राब्दपादं चरेत्पुनरुपनयनं च ॥ १८ ॥


१. विहितमिति घ. पु.
२. See. मनु. ८. १३५, १३६.