भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 486 में से

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पृष्ठ 220
१६८बौधायन-धर्मसूत्रम्[ प्रायश्चित्तम्

कानि पुनस्तानि ?

^१समुद्रसंयानम् । ब्रह्मस्वन्यासापहरणम् । भूम्यनृतम् । सर्व-पण्यैर्व्यवहरणम् । शूद्रसेवनम् । शूद्राभिजननम् । तदपत्यत्वं च । ^२एषामन्यतमत्कृत्वा चतुर्थकालामितभोजिनस्स्युस्सवनानु कल्पम् । स्थानासनाभ्यां विहरन्त एते त्रिभिर्वर्षैस्तदपहन्ति पापम् ॥ २ ॥

अनु०—ये पतनीय कर्म हैं—समुद्र की यात्रा करना, ब्राह्मण की सम्पत्ति या धरोहर रखी हुई वस्तु हड़प लेना, भूमि के संबन्ध में झूठी गवाही देना, सभी प्रकार की वस्तुओं का क्रय-विक्रय करना ( चाहे वह निषिद्ध हो या न हो ), शूद्र की सेवा करना, शूद्रा स्त्री में गर्भाधान करना, इस प्रकार शूद्रा से ( अपनी शूद्रा पत्नी से भी पुत्र के रूप में उत्पन्न होना,—इनमें से कोई भी पतनीय कर्म करने पर प्रायश्चित्त के लिए भोजन की चौथी वेला को ही अल्प भोजन करे, तीनों सवन काल प्रातः, मध्याह्न और सायं ) स्नान करे, दिन में खड़ा रहे तथा रात्रि को बैठकर ही बितावे, इस प्रकार तीन वर्ष बिताने पर पतनीय कर्म का पाप नष्ट माना जाता है ॥ २ ॥

टि०—'शूद्राभिजननम्, तदपत्यत्वं च' की व्याख्या में गोविन्द स्वामी ने शूद्र की सन्तान होने की यह भी स्थिति बतलायी है कि शूद्र के यहाँ पुत्र बनकर रहना भी पतनीय कर्म है 'शूद्रस्य वा पुत्रभावः, तवायं पुत्रोऽस्मि इत्युपजीवनम् ।'

समुद्रसंयानं नावा द्वीपान्तरगमनम् । ब्राह्मणस्वन्यासापहरणं निक्षेपापहरणम् । भूम्यनृतं साक्ष्ये भूमिविषयानृतवादः । सर्वैः पण्यैर्व्यवहरणीयैरप्युभयतोदद्भिव्र्यवहरणम् । शूद्रप्रेष्यता तत्सेवनमुच्यते । शूद्रायां गर्भस्थापनं शूद्राभिजननम् । शूद्रायां स्वभार्यायामपि जातत्वं तदपत्यत्वम् । शूद्रस्य वा पुत्रभावस्तवाऽहं पुत्रोऽस्मोत्युपजीवनम् । एषामन्यतमस्मिन् कृते प्रायश्चित्तम्—चतुर्थकालाः चतुर्थे काले येषां भोजनं ते तथोक्ताः । मितभोजिनः अल्पभुजः । अपोऽभ्युपेयुस्सवनानु कल्पं त्रिषवणस्नानिनः स्थानासनाभ्यामहोरात्रयोर्यथासङ्ख्यं विहरन्त एवमाचरन्तः एते तत्पापं त्रिभिः संवत्सरैरपहन्ति अपघ्नन्तीत्यर्थः ॥२॥

^३यदेकरात्रेण करोति पापं कृष्णं वर्णं ब्राह्मणस्सेवमानः । चतुर्थकाल उदकाभ्यवायी त्रिभिर्वर्षैस्तदपहन्ति पापमिति ॥ ३ ॥


१. एतत्सूत्रं नवधा विभक्तं इ. पुस्तके ।
२. cf. आप. ध. १. २५. ११.
३. cf. आप ध. १. २७. ११.

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