भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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द्वितीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने प्रथमोऽध्यायः १६९

अनु०—ब्राह्मण एक दिन और रात्रि की अवधि में कृष्ण वर्ण के व्यक्ति की सेवा करने से जो पाप करता है वह पाप तीन वर्षों में प्रत्येक चतुर्थ भोजन वेला पर भोजन करने तथा तीनों सवनों में स्नान करने से दूर होता है ॥ ३ ॥

टि०—इस सूत्र को गोविन्द स्वामी ने शूद्रा स्त्री से या चण्डाली से मैथुन के प्रसङ्ग में लिया है । संभवतः उपर्युक्त सूत्र शूद्र वर्ण की सेवा का निषेधमात्र करता है किन्तु पूर्ववर्ती सूत्र में शूद्रसेवा के प्रसंग में नियम दिया जा चुका है । केवल एक दिन रात्रि शूद्र सेवा के इस प्रायश्चित्त में दिन में खड़े रहने और रात्रि में बैठे रहने का कठोर व्रत नहीं विहित है, संभवतः शूद्रसेवा की अल्पावधि के कारण । गोविन्द स्वामी का दृष्टिकोण भी ठीक हो सकता है ।

'कृष्णो वर्णः चण्डालोत्येके । वर्णशब्दानुपपत्तेः शूद्रैवेत्यपरे । तत्सेवनं तद्गमनम् । व्याख्यातं चतुर्थकालत्वमनन्तरसूत्रेऽपि । उदकाभ्यवायी त्रिषवण-स्नायी एकरात्रेण सकृद्गमनमाह । अभ्यासे च तदभ्यासः कर्मणः पुनः प्रयोगात् विदुषो बुद्धिपूर्वकगमन इदम् ॥ ३ ॥

अथोपपातकानि ॥ ४ ॥

अनु०—अब उपपातकों का विवेचन किया जायगा ॥ ४ ॥

वक्ष्यन्त इति शेषः । एतान्यपि पतनीयेभ्यो न्यूनानि ॥ ४ ॥

अगम्यागमनं गुर्वीसखीं गुरुसखीमपपात्रां पतितां च गत्वा भेषजकरणं ग्रामयाजनं रङ्गोपजीवनं नाट्याचार्यता गोमहिषीरक्षणं यच्चाऽन्यदप्येवंयुक्तं कन्यादूषणमिति ॥ ५ ॥

अनु०—जिन स्त्रियों से संभोग वर्जित है उनका संभोग, माता की सखी, गुरु अर्थात् पिता की सखी, अपपात्र स्त्री, तथा पतिता स्त्री से मैथुन करना, जीविका के लिए चिकित्सा करना, अनेक लोगों के लिए यज्ञ कराना, मञ्च पर अभिनयादि कला दिखा कर जीविका चलाना, नृत्य, गीत अभिनय आदि की शिक्षा देना, जीविका के लिए गाय या भैंस पालना तथा अन्य इसी प्रकार के दुष्कर्म करना, किसी कन्या को ( संभोग द्वारा या उसके किसी दोष की अफवाह उड़ाकर ) दूषित करना—ये सभी उपपातक हैं ॥ ५ ॥

अगम्याः मातृष्वसृपितृष्वस्त्राद्याः । ताश्च नारदो जगाद—

माता मातृष्वसा श्वश्रूर्मतुलानी पितृष्वसा ।
पितृव्यसखिशिष्यस्त्री भार्या पुत्रस्य या भवेत् ॥


१, कृष्णो वर्णः शूद्रः इत्युज्ज्वलायां हरदत्तः ।