भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 486 में से

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पृष्ठ 238

१८६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ पुत्रभेदाः

मृतस्य प्रसूतो यः क्लीबव्याधितयोर्वाऽन्येनाऽनुमतेन स्वे क्षेत्रे स क्षेत्रजः ॥ १७ ॥

**अनु०—**जो पुत्र मृत व्यक्ति की, नपुंसक की, रोगी की पत्नी से दूसरे व्यक्ति द्वारा अनुमति दिये जाने पर उत्पन्न किया जाता है उसे क्षेत्रज कहते हैं ॥ १७ ॥

मृतस्य स्वे क्षेत्रे प्रसूत इति सम्बन्धः। स्वक्षेत्रे स्वपाणिग्रहणादिना संस्कृते। कार्यानभिज्ञः क्लीबः तृतीया प्रकृतिः। व्याधितस्तीव्ररोगेण प्रजोत्पादनासमर्थो गृह्यते। एषां त्रयाणां भार्यायामन्येन भ्रात्रा पित्रा वाऽनुमतेन देवरेणोत्पादितः क्षेत्रजो भवति ॥ १७ ॥

स एष द्विपिता द्विगोत्रश्च द्वयोरपि स्वधारिक्थभाग्भवति॥१८॥

**अनु०—**इस प्रकार के क्षेत्रज के पुत्र के दो पिता होते हैं, दो गोत्र होते हैं और वह दोनों पिताओं को पिण्डदान आदि देने और दोनों की सम्पत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होता है ॥ १८ ॥

स एष क्षेत्रजः द्विपिता द्वौ पितरो यो जनकः क्षेत्रवांश्च। द्विगोत्रत्वमप्यस्य तद्गोत्राभ्यामेव। गोत्रभेदे सत्यस्य प्रयोजनम्—स्वधा पिण्डोदकादि। रिक्थं मृतस्य यदातिरिच्यते द्रव्यम् ॥ १८ ॥

शुश्रूषाविवाहपिण्डदानदायग्रहणस्योपयोगमाह—
अथाऽप्युदाहरन्ति—
द्विपितुः पिण्डदानं स्यात्पिण्डे पिण्डे च नामनी।
त्रयश्च पिण्डाष्षण्णां स्युरेवं कुर्वन्न मुह्यतीति ॥ १९ ॥

**अनु०—**इस विषय में धर्मशास्त्रज्ञ निम्नलिखित पद्य उद्धृत करते हैं—
दो पिताओं वाले व्यक्ति का पिण्डदान प्रति पिण्ड के साथ दो नामों के उच्चारण के साथ होता है। तीन ही पिण्ड छः पिण्डों का प्रयोजन सिद्ध करते हैं। इस प्रकार पिण्डदान करने वाला भ्रान्ति का दोषी नहीं होता है ॥ १९ ॥

नामनी उत्पादयितुः क्षेत्रिणश्च। तयोस्सह पिण्डदाने सति त्रय एव पिण्डाष्षण्णां स्युः। 'पित्रे पितामहाय' इति च वचनात् ॥ १९ ॥

मातापितृभ्यां दत्तोऽन्यतरेण वा योऽपत्यार्थे परिगृह्यते स दत्तः॥२०॥

**अनु०—**जो पुत्र माता और पिता द्वारा प्रदत्त होकर या उन दोनों में केवल एकद्वारा प्रदत्त होने पर पुत्र के स्थान पर ग्रहण किया जाता है वह दत्त-पुत्र कहलाता है ॥ २० ॥

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