बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः १८५
पुत्रिकापुत्रेत्येवंलक्षणः पुत्रो मातामहस्यैवेत्येतत्प्रकटयति—
अथाऽप्युदाहरन्ति — आदिशेत्प्रथमे पिण्डे मातरं पुत्रिकासुतः । द्वितीये पितरं तस्यास्तृतीये च पितामहमिति ॥ १६ ॥
**अनु०—**इस विषय में निम्नलिखित पद्य उद्धृत किया जाता है—पुत्रिकापुत्र श्राद्ध का प्रथम पिण्ड अपनी माता को प्रदान करे, दूसरा पिण्ड उसके पिता को तथा तीसरा पिण्ड उसके पितामह को अर्पित करे ॥ १६ ॥
**टि०—**पुत्रिकापुत्र के लिए माता ही पिता का स्थान ग्रहण करती है । दूसरा पिण्डदान माता के पिता को अर्थात् अपने मातामह को अर्पित करे । तीसरा पिण्ड अपनी माता के पितामह अर्थात् अपने मातामह के पिता को दे ।—गोविन्दस्वामी । ब्यूहलेर ने तीसरे पिण्डदान के विषय में अनुवाद में अपने पितामह को अर्पित करे ऐसा अर्थ किया है । मनु ने तीसरे पिण्डदान को अपने पितामह के अर्पित किये जाने का उल्लेख किया है ।
मातुः प्रथमतः पिण्डं निर्वपेत्पुत्रिकासुतः ।
द्वितीयं तु पितुस्तस्यास्तृतीयं तु पितुः पितुः ॥
वसिष्ठ ने पुत्रिकापुत्र के विषय में संवाद का निम्नलिखित प्रकार बताया है कि पिता पुत्री को अलंकृत कर उसके पति को अर्पित करते हुए कहे कि इससे जो पुत्र होगा वह मेरा पुत्र माना जायगा ।
अभ्रातृकां प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलंकृताम् ।
अस्यां जनिष्यते पुत्रः स मे पुत्रो भवेदिति ॥
गौतमधर्मसूत्र में इस सम्बन्ध में निम्नलिखित पद्य द्रष्टव्य है: पितोत्सृजेत् “पुत्रिकामनपत्योग्निं प्रजापति चेष्ट्वास्मदर्थमपत्यमिति संवाद्यं । ३ । १० । १६ चौखम्बा संस्करण का पृष्ठ २७९ ।
पिण्डपितृयज्ञे क्रियमाणे प्रथमं पिण्डं मातरमुद्दिश्य दद्यात् । स्त्रियाः पिण्डदानं वचनप्रामाण्याद्भवति । पितृस्थानीया हि सा । द्वितीये मातुः पितरमात्मनो मातामहम् । तृतीये तस्याः पितामहमात्मनो मातामहपितरम् । यद्वा—मातरं परिहाप्यैव पिण्डदानम् । कुत एतत् ? कर्मान्ते प्रदर्शनात् । तन्न युक्तम्—कथं खलु पुत्रिकापुत्रस्य पिण्डदानं भवतीति पृष्ट्वा एतत्तेऽमुष्यै पितामह मम प्रपितामह ये च त्वामनु, एतत्तेऽमुष्यै प्रपितामह मम प्रपितामह ये च त्वामन्विति अमुष्यै अमुष्या इति स्वमातरं निर्दिशति ॥ १६ ॥