भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 486 में से

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"आचारहीनस्य तु ब्राह्मणस्य वेदाः षडङ्गास्त्वखिलाः सयज्ञाः।
कां प्रीतिमुत्पादयितुं समर्था अन्धस्य दारा इव दर्शनीयाः॥"
—वसिष्ठधर्मसूत्र, ६.४

धर्मशास्त्रकारों ने सर्वत्र आचार को व्यक्ति के सम्मान, दीर्घ जीवन और सुख का कारण माना है—

"आचारो भूतिजनन आचारः कीर्तिवर्धनः।
आचाराद् वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम्॥"

सभी धर्मसूत्रों ने धर्म के स्रोतों के अन्तर्गत शिष्ट लोगों के आचार को भी गिनाया है जैसे—"वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः"। ज्ञान का अपने आप में कोई महत्त्व नहीं। ज्ञान का महत्त्व आचार में परिणत करने पर ही होता है। धर्मसूत्रकारों ने और भारतीय दार्शनिकों ने चिन्तन में समय नहीं गँवाया है, अपितु जीवन को दर्शन के अनुसार ढालने का प्रयत्न किया है। भारतीय संस्कृति में दर्शन और आचार का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध ऐसा ही है जैसे "विज्ञान और प्रयोग का ज्ञान और योग का।" धर्म, दर्शन और नीति एक दूसरे पर निर्भर हैं और एक दूसरे के पूरक हैं। भारतीय धर्म की इसी विशेषता की ओर जॉन केअर्ड ने अपने ग्रन्थ An Introduction to Philosophy of Religion में संकेत किया है।

"Indian Philosophers and thinkers have declared that the philosophy and ethics both are interdependent. There can be no intellectual growth without a morally elevated life. To be a good philosopher a man should be religious, moral and of good conduct."

धर्म अपने सर्वोत्तम रूप में व्यवहार पर अधिक बल देता है धर्म की व्याख्या या परिभाषा साधन मात्र है, साध्य नहीं।

धर्म का उपदेशमात्र पर्याप्त नहीं होता उसका यथार्थ रूप में आचरण महत्त्वपूर्ण है। डॉ० राधाकृष्णन् के शब्दों में—

"Religions, at their best, insist on behaviour more than on belief. Orthodoxy is not confined to the defining of faith. It includes the living of it. Definition is the means and not the end. A vehicle is not more important than the good to which it is to take us. We must live religion in truth and deed and not merely profess it in words."
—( Recovery of Faith. p. 26 )

भारतीय धर्म या दर्शन में नैतिक भावनाओं का केवल प्रतिपादन ही नहीं किया गया है, अपितु उसे वास्तविक जीवन की कसौटी पर कसा गया है। नैतिक विचारों को अभिव्यक्त करते समय तथा उनका विधान करते समय धर्मशास्त्रकार को यह पूर्ण ध्यान है कि मनुष्य में स्वाभाविक दुर्बलता होती है। वह गलतियाँ करता है। धर्मशास्त्रकार मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलता तथा पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को नियन्त्रित