बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[ २१ ]
कर कल्याण एवं श्रेयस के मार्ग की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। मनुष्य के स्वाभाविक प्रवृत्तियों की ओर मनु ने स्पष्ट रूप से संकेत किया है—
"न मांसभक्षणे दोषो न मद्ये न च मैथुने ।
प्रवृत्तिरेषा भूतानां निवृत्तिस्तु महाफला ॥"
गौतम ने भी "दृष्टो धर्मव्यतिक्रमः साहसं च महताम् ।" ( १-१-३ ) कह कर मनुष्य की स्वाभाविक दुर्बलता का ही संकेत किया है। महान् पुरुषों ने भी धर्मविरोधी आचरण किये हैं, इसी कारण हिन्दूधर्म में यह भी स्पष्ट कह दिया गया है कि जो भी प्राचीन है वह सभी उत्तम नहीं समझ लेना चाहिए। प्रत्येक नया काव्य भी प्रशंसनीय नहीं हो जाता। बुद्धिमान् व्यक्ति परखकर ही उत्तम वस्तु को ग्रहण करते हैं, किन्तु मूर्ख व्यक्ति दूसरे के कहने के अनुसार ही चलता है—
"पुराणमित्येव न साधु सर्वं
न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद् भजन्ते
मूढः परप्रत्ययनेय बुद्धिः॥"
वेद और पुराणों के प्राचीन आख्यानों में तो देवताओं को भी मनुष्य के समान बुराइयों और दुष्कर्मों में लिप्त दिखाया गया है और धर्मसूत्र भी स्पष्ट रूप से कहता है कि महान् व्यक्तियों या देवों के सभी कार्य अनुकरणीय नहीं होते। प्राचीन महापुरुषों में आत्मतेज तथा पुण्य था, इस कारण वे धर्म के विपरीत आचरण करके भी पाप के भागी नहीं हुए, किन्तु मनुष्य की शक्ति सीमित होती है, अतः वह धर्म के विरुद्ध आचरण कर सुख नहीं प्राप्त कर सकता। धर्मशास्त्र की दृष्टि में आचार का इतना अधिक महत्त्व है कि आचारहीन पिता के परित्याग का भी आदेश दिया गया है—
"त्यजेत्पितरं राजघातकं शूद्रयाजकं शूद्रार्थयाजकं वेदविप्लावकं भ्रूणहनं यश्चान्त्यावसायिभिः संवसेदन्त्यावसायिन्यां वा।"—गौतमधर्मसूत्र ३,२,१, पृ० २०७ ।
आचारहीन व्यक्ति के लिए धर्मसूत्र में सामाजिक अपमान का विधान किया गया है। व्यक्ति अपने कर्मों के कारण पतित होता है और पतित व्यक्ति को समाज से बहिष्कृत करने का विधान है। धर्मसूत्र पातक कर्मों से घृणा करता है, पातकी से नहीं, पाप से घृणा करता है पापयुक्त से नहीं। इसी कारण पातक कर्मों से पतित व्यक्ति के लिए प्रायश्चित्त का विधान किया गया है, किन्तु धर्मसूत्र की दृष्टि में जीवन इस लोक तक ही सीमित नहीं है, परलोक में भी या दूसरे जन्म में भी जीवन का क्रम चलता रहता है। इस कारण घोर पातक कर्मों के प्रायश्चित्तस्वरूप शरीर का अन्त कर देने की भी व्यवस्था की गयी है। मनुष्य दूसरे जन्म में पापमुक्त होकर जन्म ग्रहण करता है। पाप और प्रायश्चित्त की धारणा के पीछे आचार के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। धर्मसूत्र में यह माना गया है कि मनुष्य बुरे कर्मों के पाप से सन जाता है—"अथ खल्वयं पुरुषो याप्येन कर्मणा लिप्यते" ( ३,१,२ ) और मनुष्य के कर्म स्थायी फल उत्पन्न करते हैं। पाप कर्म के साधन शरीर और मन हैं। इन दोनों की शुद्धि के लिए ही धर्मसूत्रों में प्रायश्चित्त की व्यवस्था की गयी है। प्रायश्चित्त मन में पश्चात्ताप उत्पन्न