भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 242, कुल 486 में से

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पृष्ठ 242

१९० बौधायन-धर्मसूत्रम् [ पुत्रभेदाः

औपजङ्घनिराचार्यो मन्यते स्म। प्रथमः औरस एव पुत्रो न पुत्रिकापुत्रा- दय इति ॥ ३३ ॥

'इदानीमहमीर्ष्यामि स्त्रीणां जनक नो पुरा । यतो यमस्य सदने जनयितुः पुत्रमब्रुवन् ॥ ३४ ॥

अनु०— हे जनक, अब मैं अपनी स्त्रियों के प्रति अधिक ईर्ष्या से सावधान रहता हूँ पहले ऐसा नहीं करता था। क्योंकि यम के भवन में ऐसा कहा गया है कि मृत्यु के बाद पुत्र उत्पन्न करने वाले का ही होता है ॥ ३४ ॥

टि०— इस सूत्र में निम्नलिखित कथा उल्लिखित है। गोविन्द स्वामी की व्याख्या के आधार पर यह इस प्रकार है—ओपजंघनि ने जनक से इस प्रकार कहा-कृतयुग में यम ने ऋषियों को बुलाकर पूछा—दूसरे की पत्नियों से उत्पन्न पुत्र उत्पन्न करने वालेका होता है या क्षेत्री का होता है। तब ऋषियों ने यही निर्णय किया कि मृत्यु के बाद पुत्र उत्पन्न करने वाले का ही होता है, क्षेत्री का नहीं।

स हि जनकं राजानं प्रकृत्यैवमुवाच—

यमः कृतयुगे मन्दिरे ऋषीनाहूय पप्रच्छ—परदारेषूत्पादितः पुत्रः किं जन- यितुरिति ? उताहो क्षेत्रिण इति। एवं पृष्टे ते प्रजा जनयितुरेवेति निश्चित्य अब्रुवन्। तदिदमाह—पुरा यमस्य सदने जनयितुः पुत्रमब्रुवन्। इदानीमहमि- त्यादि। सम्प्रति अहमीर्ष्यामीति न सहे। स्त्रीणामिति द्वितीयार्थे षष्ठी। अथवा स्वार्थ एव। स्त्रीणां चरन्तं पुरुषं नेर्ष्यामोत्यर्थः। हे जनक ! पुरा यस्माद्यमस्य धर्मराजस्य सदने वेश्मनि जनयितुरेव पुत्रमब्रुवन्नृषयो, न क्षेत्रिण इति। न हि यमराजसकाशे निश्चितोऽर्थो मिथ्या भवितुमर्हतीत्यौप- जङ्घनेः मुनेर्मतम् ॥ ३४ ॥

रेतोधाः पुत्रं नयति परेत्य यमसादने । तस्माद्भार्या रक्षन्ति बिभ्यन्तः पररेतसः ॥ ३५ ॥

अनु०— वीर्यं का आधान करने वाला मृत्यु के बाद पुत्र को यम के यहां ले जाता है। इस कारण लोग दूसरे पुरुष से वीर्याधान की आशंका करते हुए अपनी पत्नियों की रक्षा करते हैं ॥ ३५ ॥

रेतो दधातीति रेतोधाः बीजं पुत्रं प्रकृतं नयति भुङ्क्ते पुत्रफलं लभते परेत्य मृत्वा यमसादने पुण्यपापफलोपभोगस्थाने। नैवं क्षेत्री। यस्मादेवं तस्मात्पररेतसो बिभ्यन्तो भार्या रक्षन्ति ॥ ३५ ॥


१. cf. आप. ध. २. १३. ६,