भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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तृतीयः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः १९३

सूत्र के साथ स्त्रियों के कर्तव्य का नया विषय आरम्भ किया है जैसे गौतमधर्मसूत्र में 'अस्वतन्त्रा धर्मे स्त्री कहकर एक नया अध्याय आरम्भ किया गया है । किन्तु इसके साथ ही यह भी द्रष्टव्य है कि पुनः ४७ वें सूत्र में सूत्रकार दायभाग के विषय पर ही निर्देश देता है ।

दायलब्धे तु तस्याः स्वातन्त्र्यं भवेत् कृतकृत्यताभिमानेनेत्यभि- प्रायः ॥ ४५ ॥

अथाऽप्युदाहरन्ति— 'पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । पुत्रस्तु स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हतीति ॥ ४६ ॥

अनु०—इस सम्बन्ध में निम्नलिखित पद्य उद्धृत किया जाता है— स्त्री की कुमार्यावस्था में पिता रक्षा करता है, युवावस्था में पति रक्षा करता है, वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतन्त्र जीवन के योग्य नहीं होती ॥४६॥

टि०—द्रष्टव्य—मनु० ९।३

तस्यां तस्यामवस्थायाममरक्षतामेतेषां दोषः ॥ ५६ ॥

निरिन्द्रिया ह्यदायाश्च स्त्रियो मता इति श्रुतिः ॥ ४७ ॥

अनु०—श्रुति में भी कहा गया है कि स्त्रियों में बल नहीं होता और वे सम्पत्ति के भाग की अधिकारिणी भी नहीं होती ॥ ४७ ॥

'न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हतो'त्यनेन सिद्धो दायप्रतिषेधः पुनरनूद्यते निन्दाशेष- तया । निरिन्द्रियाः निर्गतरसाः । तदेतद्ववश्यागन्तव्यानृतत्वप्रदर्शनार्थम् । आह च—

शय्यासनमलङ्कारं कामं क्रोधमनार्यताम् । द्रोहभावं कुचर्यां च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयदिति ॥ ४७ ॥

भर्तृहिते यतमानास्स्वर्गं लोकं जयेरन् ॥ ४८ ॥

अनु०—जो स्त्रियां पति के सुख के लिए प्रयत्न करती रहती हैं वे स्वर्ग लोक प्राप्त करती हैं ॥ ४८ ॥

भर्तृहिते स्नापनप्रसाधनमर्दनादिभिर्भर्तारं नातिक्रमेदिति यावत् ॥ अत्रैव प्रसङ्गात् प्रायश्चित्तमाह—

व्यतिक्रमे तु कृच्छ्रः ॥ ४९ ॥


१. See. मनु. ९. ३. १६ बौ०ध०