बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९२ बौधायन-धर्मसूत्रम् [ पुत्रमातृभरणम्
नपुंसक, बुरी आदत में पड़े हुए, रोगी पुत्रों को, कोई कर्म करने में असमर्थ को; किन्तु पतित को तथा उसके पुत्रों का भरण-पोषण न करे ॥ ३८-४१ ॥
बिभृयादित्यनुवर्तते । अन्धः प्रसिद्धः । अकिञ्चित्करो जडः । क्लीबः षण्ढनामा तृतीया प्रकृतिः । व्यसनी द्यूतादिषु प्रसक्तमनाः । अचिकित्स्यरोगी व्याधितः । आदिग्रहणात्परत्र पङ्कुकुब्जादयो गृह्यन्ते । अकर्मणस्समर्था अपि सन्तो निरुत्साहाः । पतितस्तत्सुतश्च पतिततन्जातौ । तथा च वसिष्ठः-‘पतितोत्पन्नः पतितो भवतीत्याहुरन्यत्र स्त्रियाः’ इति ॥ ३८-४१ ॥
न पतितैस्संव्यवहारो विद्यते ॥ ४२ ॥
अनु०—पतितों के साथ किसी प्रकार का सम्पर्क न होना चाहिए ॥ ४२ ॥
औरसैरप्राप्तव्यवहारैरपि । भरणन्तु । तेषां कर्तव्यमित्युक्तम् ॥ ४२ ॥
पतितामपि तु मातरं बिभृयादनभिभाषमाणः ॥ ४३ ॥
अनु०—किन्तु पतिता होने पर भी माता का भरण-पोषण करे, परन्तु उससे भाषण न करे ॥ ४३ ॥
यद्यपि माता भाषेत च । तथा च गौतमः—‘न कर्हिचिन्मातापित्रोरवृत्तिः’ इति । अवृत्तिरशुश्रूषा अरक्षणं वा ॥ ४३ ॥
उक्तः पुत्राणां दायविभागः । दुहितरः किं लभेरन्नित्यत आह--
मातुरलङ्कारं दुहितरस्साम्प्रदायिकं लभेरन्नन्यद्वा ॥ ४४ ॥
अनु०—पुत्रियां माता के उन आभूषणों को प्राप्त करती है, जो परम्परा से मिले हुए हों अथवा अन्य वस्तु भी जो परम्परा से उपहार मिली हो उसे प्राप्त करें ॥ ४४ ॥
टि०—साम्प्रदायिक का तात्पर्य है स्थानीय रीति के अनुसार प्राप्त । यहाँ उस आभूषण से तात्पर्य है जो नाना और नानी से मिले हों । इसी प्रकार नाना या नानी से माता को मिले हुए उपहार को पुत्री प्राप्त करती है ।
साम्प्रदायिकमित्यलङ्कारविशेषः । सम्प्रदायागतो लब्धस्साम्प्रदायिकः मातामहेन मातामह्या वा स्वमात्रे यद्दत्तं तत्साम्प्रदायिकं अन्यत् असाम्प्रदायिकं खट्वादिशनप्रावरणादिकमात्मनः । एतावदेव दुहितरो लभेरन् नाऽन्यत् ॥ ४४ ॥
न स्त्री स्वातन्त्र्यं विदन्ते ॥ ४५ ॥
अनु०—स्त्रियों को स्वतन्त्रता नहीं होती ॥ ४५ ॥
टि०—इस सूत्र की व्याख्या में गोविन्दस्वामी ने इस सूत्र को सम्पत्ति के बंटवारे के सम्बन्ध में लिया है । किन्तु जैसा ब्यूहलेर ने ठीक ही निर्णय किया है—इस