भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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चतुर्थः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः २०५

टि०—दीनता से यहां याचकता आदि का भाव भी लिया गया है, परोपकार न करना शठता है। सूत्र में च शब्द के प्रयोग से अश्लीलादि भाषण का भी अर्थ ग्रहण करना चाहिए—गोविन्दस्वामी।

आत्मनः क्षीणत्वप्रदर्शनेन याचिष्णुता¹ दैन्यम्। शक्तौ सत्यामपि परोपकाराकरणं शाठ्यम्। जैह्म्यं कौटिल्यम्। चशब्दादश्लीलादिकमपि ॥ २५ ॥

दैन्यं पुनः प्रयत्नेन वर्जनीयम् अस्मिन्नर्थे गाथामाह—

अथाऽप्यत्रौशनसश्च वृषपर्वणश्च दुहित्रोस्संवादे गाथामुदाहरन्ति ॥२६॥

अनु०—इस संबन्ध में उशना और वृषपर्वा की पुत्रियों के बीच हुए संवाद की एक गाथा उद्धृत की जाती अ है— तुम उसकी पुत्री हो जो दूसरों का स्तुति करता है, याचना करता है, तथा दान ग्रहण करता है, किन्तु मैं ऐसे व्यक्ति की पुत्री हूं, जिसकी स्तुति की जाती है, जो याचकों को दान देता है, किसी से दान स्वीकार नहीं करता ॥ २६ ॥

टि०—यह संवाद शर्मिष्ठा तथा देवयानी के संवाद के रूप में महाभारत में भी आया है। पूर्वार्ध में देवयानी के पिता उशना के दीन स्वभाव का उल्लेख है।

उशनाः शुक्रः, तस्य दुहिता देवयानी वृषपर्वा तु क्षत्रियः, तस्य दुहिता शर्मिष्ठा। तयोस्संवादो विसंवादः गाथाश्लोकः ॥ २६ ॥

स्तुवतो दुहिता त्वं वैयाचतः प्रतिगृह्णतः । अथाऽहं स्तूयमानस्य ददतोऽप्रतिगृह्णतः ॥ ददतोऽप्रतिगृह्णतः इति ॥ २७ ॥

इति बौधायनीये धर्मसूत्रे द्वितीयप्रश्ने चतुर्थः खण्डः ॥

प्रतिशाङ्गं प्रभाषते तत्र पूर्वेणाऽर्धेन देवयान्याः पितुरुशनसो दीनस्वभावत्वं कथयति। उत्तरेण चाऽऽत्मनः पितुर्वृषपर्वणः ततो विपरीतस्वभावत्वम् ॥ २७ ॥

इति श्रीगोविन्दस्वामिविरचिते बौधायनधर्मसूत्रविवरणे द्वितीयप्रश्ने द्वितीयोऽध्यायः ॥


१. वागाविष्करणं दैन्यमिति घ. पु०