भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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पञ्चमः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः २०७

**अनु०—**इस सम्बन्ध में निम्नलिखित पद्य किया जाता है— तीन द्विजाति वर्ग के पुरुष प्रातःकाल उठकर बहती हुई अनवरुद्ध जल की धारा से देवता ऋषि तथा पितरों का तर्पण करें ॥ ४ ॥

**टी०—**बहती हुई अनवरुद्ध जल की धारा से यहां नदी में स्नान करने का नियम स्पष्टतः प्रतीत होता है ।

स्रवन्तीष्वनिरुद्धास्विति नद्यां प्रातःस्नानं विधीयते न तटाकादिषु कुल्यासु वा ॥ ४ ॥

इतरथा दोषमाह— निरुद्धासु न कुर्वीरन्नंशभाक्तत्र सेतुकृत् ॥ ५ ॥

**अनु०—**ऐसे जल में स्नानतर्पण नहीं करना चाहिए, जो चारो ओर जल से बंधा हो, ऐसे (तालाब कूप आदि में) जलाशय में स्नान-तर्पण करने पर उसके पुण्य का अंश तालाब या कूप को बंधवाने वाले को मिलता है ॥ ५ ॥

निरुद्धासु यदि कुर्वीरन्निति शेषः। सेतुकृत् खननकृत् । तत्र सेतुकृत् स्नानत-र्पणादिपुण्यफलांशभाग्भवति । पुण्यकर्ता च सेतुकृदेनोंशभाक् । आह च— परकीयनिपानेषु न स्नायाच्च कदाचन । निपानकर्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते ॥ इति ॥ निपानं तटाक-कूपादि ॥ ५ ॥

उपसंहरति— तस्मात् परकृतान् सेतून् कूपांश्च परिवर्जयेदिति ॥ ६ ॥

**अनु०—**अतएव दूसरों द्वारा बनवाये गये तालाब के घाटों तथा कूपों में स्नान तर्पण आदि का परिवर्जन करें ॥ ६ ॥

एतन्निर्वाहकं परकीयमतेनोपन्यस्यति— अथाऽप्युदाहरन्ति— उद्धृत्य वाऽपि त्रीन् पिण्डान् कुर्यादापत्सु नो सदा । निरुद्धासु तु मृत्पिण्डान् कूपात् त्रीनब्घटांस्तथेति ॥ ७ ॥

**अनु०—**इस सम्बन्ध में निम्नलिखित पद्य उद्धृत किया जाता है आपत्काल में (तालाब आदि घिरे हुए) जल में से तीन मुट्ठी मिट्टी निकाल कर ओर कूप आदि में घिरे हुए जल में से तीन घड़ा जल निकालकर स्नान तर्पण किया जा सकता है, किन्तु यह नियम सदा नहीं होता है ॥ ७ ॥