बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २१४ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ स्नातकधर्माः |
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मांसमत्स्यतिलसंसृष्टप्राशनेऽप उपस्पृश्याऽग्निमभिमृशेत् ॥ २ ॥
**अनु०—**मांस, मछली, या तिल से युक्त भोजन खाने के बाद जल से शुद्धि कर अग्नि का स्पर्श करे ॥ २ ॥
संसृष्टशब्दः प्रत्येकमभिसम्बध्यते । यावद्भिर्मांसपरमाणुभिर्मिश्रित ओदने तद्रसोपलब्धिर्भवति तावद्भिस्संसृष्टस्य प्राशने इदं प्रायश्चित्तम् । ननु मांससंसृष्टनिषेधादेव मत्स्यसंसृष्टस्याऽपि निषेधसिद्धेः कुतः पृथगुपादानं ? मत्स्यार्थमिति । उच्यते-मत्स्यगन्धोपलब्धावपि प्रायश्चित्तं भवतीत्यभिप्रायः । तिलसंसृष्टं तिलौदनम् ॥ २ ॥
'अस्तमिते च स्नानम् ॥ ३ ॥ पालाशमासनं पादुके दन्तधावनमिति वर्जयेत् ॥ ४ ॥ नोत्सङ्गेऽन्नं भक्षयेत् ॥ ५ ॥ आसन्द्यां न भुञ्जीत ॥ ६ ॥ वैणवं दण्डं धारयेद्रुक्मकुण्डले च ॥ ७ ॥ पदा पादस्य प्रक्षालनमधिष्ठानं च वर्जयेत् ॥ ८ ॥ न बहिर्मालां धारयेत् ॥ ९ ॥
सूर्यमुदयास्तमये न निरीक्षेत ॥ १० ॥
**अनु०—**और सूर्य के अस्त होने पर स्नान करे। पलाश के बने आसन और खड़ाऊँ तथा पलाश की दातौन का प्रयोग न करे। अपनी गोद में रखकर भोजन न करे। किसी आसन पर रखकर भोजन न करे। बाँस का डण्डा धारण करे और कानों में सोने के कुण्डल पहिने। स्नान करते समय एक पैर को दूसरे पैर से न रगड़े और खड़े रहते समय एक पैर के ऊपर दूसरा पैर न रखे। बाहर की ओर दिखायी पड़ने वाली माला न धारण करे। उदय और अस्त के समय सूर्य के ऊपर दृष्टिपात न करे ॥ ३-१० ॥
अदृष्टार्थमेतद्व्रतम् ॥ ३-१० ॥
नेन्द्रधनुरिति परस्मै प्रब्रूयात् ॥ ११ ॥ यदि ब्रूयान्मणिधनुरित्येव ब्रूयात् ॥ १२ ॥
**अनु०—**इन्द्रधनुष देखकर दूसरे व्यक्ति से 'इन्द्रधनुष दिखाई पड़ रहा है' ऐसा न कहे। यदि कहना ही हो तो 'मणिधनु' नाम लेकर कहे ॥ ११-१२ ॥
१. तृतीयादीनि नवयान्तानि सूत्राणि व्याख्यानपुस्तकेषु नोपलभ्यते, न च व्याख्यातानि व्याख्यात्रा। अतश्च स एषामभावमेवाऽभिप्रेतीति प्रतीयते See• P 152. L.L. 7.