बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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प्राचीन माने जाते थे। धर्मसूत्र में ही कई बार बौधायन का उल्लेख होने से भी यह स्पष्ट है इस धर्मसूत्र का रचयिता कण्व बौधायन का वंशज था। गोविन्दस्वामी ने भी बौधायन को काण्वायन कहा है।
बौधायन के निवासस्थान का निर्धारण करना भी कठिन है। बौधायन शाखा के अनुयायी दक्षिण भारत में मिलते हैं। किन्तु धर्मसूत्र में जो भौगोलिक विवरण मिलते हैं उनके आधार पर बौधायन दक्षिण भारतीय थे यह कहना कठिन है। १. १. २ में दक्षिण और उत्तर के आचारों की भिन्नता का उल्लेख है और दक्षिण भारत के देशों को गिनाया गया है, किन्तु उनसे बौधायन के संबद्ध न होने का ही संकेत अधिक मिलता है। बौ. १. २. ४ में "अथोत्तरतः ऊर्णाविक्रयः शीधुपानमुभयतोदद्भिर्व्यवहारः आयुधीयकं समुद्रसंयानमिति" में समुद्रयात्रा को उत्तरभारतीय विशिष्ट आचारों के अन्तर्गत बताया गया है और २. २. २ में 'समुद्रसंयान' को पतनीय कर्मों में प्रथम बताया गया है। इससे बौधायन का दक्षिण भारतीय होना ही सिद्ध होता है। किन्तु जैसा कि ब्यूह्लर ने लिखा है, बौधायनीय शाखा के दक्षिण भारतीय होने का सर्वाधिक निर्णायक प्रमाण यही है कि आपस्तम्बीय शाखा के समान बौधायनीय शाखा भी दक्षिण भारत में मिलती है।
“But the most conclusive argument in favour of the southern origin of Baudhayaniyas is that they, like the Apastambiyas and all other adherents of the Taittiriya schools are entirely confined to the Dekhan, and are not found among the indigenous subdivisions of the “Brahmanas in Central and Northern India.” (p. 42)
दक्षिण भारत के अनेक राजाओं ने बौधायनीय शाखा के ब्राह्मणों के नाम कई दानपत्र लिखे हैं। इससे भी बौधायनीयों का दक्षिण भारतीय होना सिद्ध होता है। बौधायन धर्मसूत्र की अधिकांश पाण्डुलिपियाँ दक्षिण भारत में ही उपलब्ध होती हैं यह भी बौधायनीय शाखा के दक्षिण भारतीय होने का प्रमाण है। परम्परया माधवाचार्य तथा सायण को बौधायनीय मानते हैं। इससे भी इस शाखा का दक्षिणी होना सिद्ध है।
“Besides, the interesting tradition which asserts that Madhava-Sayana, the great commentator of the Vedas, was a Baudhayaniya is another point which may be brought forward as evidence for the location of the school in southern India.
बौधायन ने समुद्र यात्रा तथा समुद्र के व्यापार पर लगने वाले कर का उल्लेख किया है। इससे उनसे समुद्रतट के प्रदेश और विशेषतः आन्ध्र का निवासी कहा जाता है। उन्होंने तैत्तिरीय आरण्यक के आन्ध्र पाठ का ही उपयोग किया है।
बौधायनधर्मसूत्र में प्रक्षिप्त अंश
बौधायनधर्मसूत्र में विषयवस्तु के विभाजन की जो अस्तव्यस्तता है वह स्पष्टतः इस तथ्य का संकेत करती है कि इसमें बाद के समय में भी समय-समय पर प्रक्षेप