बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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हुए हैं। यथा, चतुर्थ प्रश्न अपनी शैली के कारण बाद में जोड़ा गया माना जाता है। प्रथम चार अध्यायों में प्रायश्चित्त का विवेचन किया गया है, शेष अध्यायों में सिद्धि-प्राप्ति के उपायों का वर्णन है, जिसके अन्तर्गत गणहोम का वर्णन है। ब्यूह्लर के शब्दों में प्रथम ४ अध्याय अनावश्यक और पिष्टपेषण मात्र है—
“The first part is perfectly superfluous, as the subject of penances has already been discussed in the first sections of the second Prasna, and again in chapters 4–10 of the third Prasna.
सिद्धिविषयक अध्याय भी धर्मसूत्रों के विषय क्षेत्र से परे है। इसकी शैली स्पष्टतः पूर्ववर्ती सम्पूर्ण अंशों से भिन्न है। कण्डिका या खण्ड के स्थान पर अध्यायों में विभाजन भी चतुर्थ प्रश्न के क्षेपक होने का प्रमाण है। चतुर्थ प्रश्न की शैली के विषय में ब्यूह्लर ने उचित ही कहा है—
“The epic sloka nearly throughout replaces the aphoristic prose, and the common slip-shod Sanskrit of the Puranas appears instead of the archaic forms.”
तृतीय और चतुर्थ प्रश्नों में यह समानता है कि प्रश्न का विभाजन केवल अध्याय में है, खण्ड या कण्डिका में नहीं। किन्तु शैली की दृष्टि से तृतीय प्रश्न पहले के दो प्रश्नों के समान है। वस्तुतः तृतीय प्रश्न भी धर्मसूत्र के किसी महत्त्वपूर्ण विषय का विवेचन नहीं करता, अपितु पूर्ववर्ती प्रश्नों में विवेचित विषयों पर ही कुछ अतिरिक्त नियम देता है। इस प्रश्न में दूसरे धर्मशास्त्रीय ग्रन्थों से लिये गये उद्धरणों की मात्रा भी अधिक है। इसका १० वां अध्याय गौतमधर्मसूत्र से ही उद्धृत है और छठा अध्याय विष्णु-धर्मसूत्र के ४८ वें अध्याय के समकक्ष है। ऐसी स्थिति में कतिपय विद्वानों ने बौधायन धर्मसूत्र को मूलतः दो प्रश्नों का माना है। ब्यूह्लर के शब्दों में—
“These Circumstances justify, it seems to me, the assumption that Baudhayana’s original Dharma-sutra consisted, like Apastamba’s of two Prasnas only, and that it received through followers of his school, two separate additions, first in very ancient times Prasna III, where the style of the master is strictly followed, and later Prasna IV, where the language and phraseology of the metrical Smritis are adopted.”
बौधायन-धर्मसूत्र की शैली
बौधायनधर्मसूत्र की शैली अन्य धर्मसूत्रों की अपेक्षा सरल है। इसमें अक्षरों को बचाने का आग्रह नहीं दिखायी पड़ता। कई स्थलों पर एक सूत्र में बात को न कह कर बौधायन ने दो सूत्रों में उसी अभिप्राय को स्पष्ट किया है। १. ३. १९. “ते ब्राह्मणा-द्यास्त्वकर्मंस्याः” सूत्र की टीका में गोविन्दस्वामी ने भी इस तथ्य की ओर निर्देश किया है कि बौधायनलाघव प्रिय नहीं हैं “सत्यम्, अयं ह्याचार्यो नातीव ग्रन्थलाघवप्रियो भवति ।”