बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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बौधायनधर्मसूत्र में सभी प्रकार की शैली का प्रयोग है—लम्बे गद्यात्मक अंश, पद्यात्मक अंश, ब्राह्मणग्रन्थों की शैली और छोटे चुस्त सूत्र भी मिलते हैं। "अथाप्यु-दाहरन्ति" कहकर ही उद्धरण दिये गये हैं और उद्धरणों के अन्त में 'इति' का प्रयोग है। 'इति श्रुतिः' द्वारा वैदिक अंशों का निर्देश किया गया है। वैदिक अंशों को 'इति विज्ञायते' द्वारा भी व्यक्त किया गया है—
'साध्वस्त्रिपुरुषमार्षाद् दश दैवाद् दश प्राजापत्याद् दश पूर्वान् दशाऽपरानात्मानं च ब्राह्मीपुत्र इति विज्ञायते।' १. २१. २.
"पर्वसु हि रजः पिशाचाश्चाष्टमीचारवन्तो भवन्तीति विज्ञायते।" १. २१. २१.
प्रथम तथा द्वितीय प्रश्न का विभाजन दो प्रकार से किया गया है—अध्यायों और खण्डों में। प्रथम प्रश्न में ११ अध्याय २१ खण्ड हैं द्वितीयप्रश्न में १० अध्याय १८ खण्ड हैं। तृतीय प्रश्न में १० अध्याय और १० ही खण्ड हैं और इसी प्रकार चतुर्थ प्रश्न में ८ अध्याय और ८ ही खण्ड हैं। इस प्रकार अन्तिम दो प्रश्नों में अध्याय और खण्ड का विभाजन एक ही है। सबसे अधिक अस्तव्यस्तता विषयवस्तु के विभाजन के संबन्ध में है। एक ही विषय का भिन्न-भिन्न अध्यायों में विवेचन है। एक ही स्थल पर सभी नियमों को समाप्त नहीं कर दिया गया है। उदाहरणार्थ, उत्तराधिकार, प्रायश्चित्त, शुद्धि, अनध्याय और पुत्रों के भेद भिन्न-भिन्न स्थलों पर विकीर्ण हैं। इसी संबन्ध में ब्यूहेर ने उचित ही कहा है—
"In other cases we find a certain awkwardness in the distribu-tion of the subject matter, which probably finds its explantion through the fact that Baudhayana fiirst attempted to bring the teaching of the Taittiriyas on the Dharma into a systematic form."
यही नहीं, ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ एक विषय के बीच दूसरे विषय से सम्बद्ध नियमों द्वारा व्यवधान आ जाता है। कुछ सूत्र ऐसे भी हैं जिनका प्रमुख विवेच्य विषय से कोई सम्बन्ध नहीं है।
चौथे प्रश्न की एक प्रमुख विशेषता है पद्यों का बहुत अधिक प्रयोग। शैली की दृष्टि से यह प्रश्न अन्य तीन प्रश्नों से भिन्न है। तीसरे प्रश्न में विष्णुधर्मसूत्र से बहुत कुछ गृहीत है। बौधायनधर्मसूत्र की भाषा प्राचीनता की ओर संकेत करती ह।
बौधायन-धर्मसूत्र का वर्ण्यविषय
बौधायन-धर्मसूत्र चार प्रश्नों में है। अन्तिम प्रश्न को परिशिष्ट माना गया है। प्रश्न का विभाजन अध्यायों और खण्डों में किया गया है। प्रथम प्रश्न में ११ अध्याय और २१ खण्ड हैं। द्वितीय प्रश्न में १० अध्याय और १८ खण्ड हैं। तृतीय प्रश्न में १० अध्याय और १० खण्ड हैं। इस प्रश्न में अध्याय और खण्ड का विभाजन एक-सा ही है। चतुर्थ प्रश्न आठ खण्डों में है। इसमें विषय का विवेचन खण्ड या अध्याय के व्यव-च्छेद से बाधित नहीं होता, अपितु एक ही विवेचन कई अध्यायों में चलता रहता है। कई स्थलों पर विषय का विवेचन क्रमबद्ध नहीं दिखायी पड़ता। ऐसे अनेक स्थल हैं