भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 486 में से

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जहाँ किसी एक विषय पर कुछ नियम देने के बाद भिन्न विषय का विवेचन करने वाले अध्यायों द्वारा व्यवधान हो गया है और फिर उसी विषय को दुबारा ग्रहण किया गया है। जैसे शुद्धि के नियम प्रथम प्रश्न के पञ्चम अध्याय में विवेचित है और फिर मांसभक्षण के विषय में नियम दिये गये हैं और उसके बाद शुद्धिविषयक नियम पुनः षष्ठ अध्याय में विहित हैं।

बौधायनधर्मसूत्र में प्रतिपादित विषयों को संक्षेप में इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है।

प्रथम प्रश्न—अध्याय १-धर्म, आर्यावर्त, विभिन्न प्रदेशों के आचार, ब्रह्मचर्य तथा उपनयन, अभिवादन के नियम। अध्याय २-शिष्य की योग्यता तथा ब्रह्मचर्य का महत्त्व। ३-स्नातक के कर्त्तव्य। ४-कमण्डलु का महत्त्व। ५-आचमन तथा वस्त्रों एवं पात्रों की शुद्धि, शुद्ध, वस्तुएँ, ब्याज का नियम, आशौच एवं अस्पृश्यता, भक्ष्याभक्ष्य। ६-भूमि एवं पात्र की शुद्धि। ७-यज्ञ के नियम। ८ एवं ९ पत्नी, विवाह, पुत्र के प्रकार। १०-कर का अंश, वर्णधर्म, वर्णानुसार मनुष्य वध का दण्ड, साक्षी की योग्यता। ११-विवाह के भेद और अनध्याय।

द्वितीय प्रश्न—अध्याय १-पातक कर्मों के प्रायश्चित्त, पतनीय कर्म कृच्छ्रव्रत के भेद। २-सम्पत्तिविभाजन तथा पुत्र के भेद, स्त्री की परतन्त्रता एवं स्त्रीधर्म। ३-स्नान, दान एवं भोजन की विधि, निवासयोग्य स्थान एवं पूज्य व्यक्ति। ४-सन्ध्योपासन, गायत्री एवं प्राणायाम। ५-शारीरिक शुद्धि एवं तर्पण। ६-गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यासी के कर्त्तव्य। ७-आत्मज्ञान। ८-श्राद्ध एवं दान की विधि। ९-सन्तानोत्पत्ति का महत्त्व। १०-संन्यास तथा आत्मयज्ञ।

तृतीय प्रश्न—अध्याय १-परिव्राजक के भेद। २-छः प्रकार की जीवनवृत्तियाँ, ३-वानप्रस्थ के भेद। ४-व्रतभङ्ग का प्रायश्चित्त। ५-९-अघमर्षण, यावकव्रत, कूश्माण्ड-होम, चान्द्रायण, अनश्नत्पारायण। १०-प्रायश्चित्त के नियम।

चतुर्थ प्रश्न—अध्याय १-प्रायश्चित्त, कन्यादान का काल, ऋतुगमन का महत्त्व, प्राणायाम। २-भ्रूणहत्या का प्रायश्चित्त, अवकीर्णी का प्रायश्चित्त। ३-रहस्यप्रायश्चित्त। ४-शास्त्रसम्प्रदाय। ५-जप तथा विविध व्रत। ६-प्रायश्चित्त के नियम। ७-धर्मपालन की प्रशंसा। ८-गणहोम।

इस संक्षिप्त विषयसूची से यह स्पष्ट हो जाता है कि बौधायनधर्मसूत्र में किसी एक अध्याय में एक ही प्रकार के विषय का विवेचन न होकर भिन्न-भिन्न प्रकार के विषयों का विवेचन हुआ है जो विषय आपस में पूर्णतः असम्बद्ध हैं अथवा यदि सम्बद्ध हैं भी तो बहुत शिथिल। इस प्रकार किसी एक विशिष्ट विषय से संबद्ध नियम इस धर्मसूत्र के आदि से अन्त तक बिखरे हुए हैं। उदाहरणार्थ—विवाह, पुत्र एवं पत्नीविषयक नियम प्रथम प्रश्न के अध्याय ८ एवं ९ में, द्वितीय प्रश्न के अध्याय २ और ९ में तथा चतुर्थ प्रश्न के प्रथम अध्याय में विवेचित है। बौधायनधर्मसूत्र की अपेक्षा गौतमधर्मसूत्र एवम् आपस्तम्बधर्मसूत्र में वर्णनविषयक क्रमबद्धता अधिक दिखायी पड़ती है।

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