भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

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षष्ठः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः २१९

पर निवास करने वाला ब्राह्मण बारह वर्ष निरन्तर रहने पर शूद्रों के समकक्ष ही हो जाता है ॥ ३२ ॥

उदपानं कूपः कूपोदकमेव पानीयं, नाऽन्यत् यस्मिन् ग्रामे स एवमुक्तः । वृषलीशब्दः प्राक् प्रदानाद्रजस्वलाया वाचकः । तथा हि—

पितुर्गृहे तु या कन्या ऋतुं पश्यत्यसंस्कृता ।
सा कन्या वृषली ज्ञेया तत्पतिर्वृषलीपतिः ॥ इति ॥

शूद्रायाः पतित्वे धर्मानुष्ठानानुपपत्तेः । एवंविधो धार्मिकोऽपि शूद्रसाधर्म्यमृच्छति । तस्मादल्पोदके ग्रामे धार्मिको न निवसेदित्यभिप्रायः ॥ ३२ ॥

ग्रामनिवास उक्तः, नगरे त्वनेवंविधेऽपि निवासनिषेधाय निन्दति—

पुररेणुकुण्ठितशरीरस्तत्परिपूर्णनेत्रवदनश्च । नगरे वसन् सुनियतात्मा सिद्धिमवाप्स्यतीति न तदस्ति ॥ ३३ ॥

**अनु०—**यदि यह कहा जाय कि नगर की धूल से जिसका शरीर धूसरित है और जिसके नेत्र और मुख उस धूल से परिपूर्ण हैं किन्तु जिसने इन्द्रियों और मन पर संयम कर रखा है वह नगर में रहता हुआ भी सिद्धि प्राप्त करता है तो ऐसी बात नहीं है (नगर का निवासी सिद्धि नहीं प्राप्त कर पाता) ॥ ३३ ॥

कुण्ठितं प्रच्छादितम् । तच्छब्देन पुररेणुरेव परामृश्यते । तेन परिपूरिते नेत्रे वदनं च यस्य स तत्परिपूर्णनेत्रवदनः । उष्ट्रखरविड्वराहगजश्वपुरीषमूत्रसुराकाकोच्छिष्टशवकपालास्थितुषभस्माद्युपहतसर्वावयव इत्यर्थः । एवंविधस्सुनियतेन्द्रियोऽपि नगरे वसन् परलोकं नाऽऽप्नोतीत्यर्थः ॥ ३३ ॥

रेणुः प्रस्तुतस्तत्राऽऽह—

रथाश्वगजधान्यानां गवां चैव रजश्शुभम् ।
अप्रशस्तं समूहन्याः श्वाजाविखरवाससाम् ॥ ३४ ॥

**अनु०—**रथों, अश्व, हाथी के चलने से उठने वाली, अनाज के साथ मिली हुई तथा गाय के पैरों से उड़ने वाली धूल पवित्र होती है, किन्तु झाडू से बुहारने पर उड़ी हुई, बकरी, भेड़, गदहे के पैरों से उठी हुई तथा कपड़े से उड़ायी गयी धूल अपवित्र होती है ॥ ३४ ॥

पूर्वाणि पञ्च रजांसि शुभानि । इतराणि षट् अप्रशस्तानि वर्ज्यानि । समूहनी सम्मार्जनी ॥ ३४ ॥

पूज्यान् पूजयेत् ॥ ३५ ॥