बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें२२० बौधायन-धर्मसूत्रम् [ पुत्रभेदाः
**अनु०—**पूज्य व्यक्तियों का सम्मान करे ॥ ३५ ॥
अवसरौचित्योपायेनाऽयमपि श्रेयस्करो नियमः। उक्तं च—‘प्रतिबध्नाति हि श्रेयः पूज्यपूजान्यतिक्रमः’ इति ॥ ३५ ॥
ऋषिविद्वन्नृपवरमातुलश्वशुरर्त्विजः ।
एतेऽर्घ्याश्शास्त्रविहिताः स्मृताः कालविभागशः ॥ ३६ ॥
**अनु०—**ऋषि विद्वान् पुरुष और राजा तथा मामा, श्वशुर और ऋत्विज ये शास्त्र के नियम के अनुसार अथवा अवसर के अनुसार अर्घ्य होते हैं ॥ ३६ ॥
**टि०—**ऋषि, विद्वान् पुरुष तथा राजा सर्वदा पूज्य होते हैं वे जब भी आवें उन्हें मधुपर्क दिया जाता है, किन्तु मामा और श्वशुर यदि एक वर्ष के अन्तर पर आवें तो मधुपर्काहं होते हैं, जब की ऋत्विज् याज्ञिक क्रिया के अवसर पर अर्घ्य है। ऋषि मन्त्रों के अर्थ का ज्ञाता होता है, विद्वान् वह है जो अङ्गों, इतिहास के साथ सम्पूर्ण वेद का प्रवक्ता हो। इस सम्बन्ध में गौतमधर्मसूत्र के नियम अत्यन्त स्पष्ट हैं ‘ऋत्विगाचार्यश्वशुरपितृव्यमातुलानामुपस्थाने मधुपर्कः। संवत्सरे पुनः। यज्ञविवाहयोर्वाक्। राज्ञश्च श्रोत्रियस्य।’ १।५ २५-२८ पृ० ५३-५४ ।
ऋषिर्मन्त्रार्थज्ञः। विद्वान् साङ्गस्य सेतिहासस्य वेदस्य प्रवक्ता। नृपोऽभिषिक्तः। क्षत्रियः। वरो वोढा दुहितुः। इतरे प्रसिद्धाः। अर्घ्याः मधुपर्कार्हा इति शास्त्रेण वेदेन चोदिताः स्मृताश्च स्मृतिकर्तृभिर्मन्वादिभिरप्यनुमोदिताः। यद्वा—कालविभागेन स्मृताः ॥ ३६ ॥
कोऽसौ कालविभाग इत्याह—
ऋषिविद्वन्नृपाः प्राप्ताः क्रियारम्भे वरर्त्विजौ ।
मातुलश्वशुरौ पूज्यौ संवत्सरगतागताविति ॥ ३७ ॥
**अनु०—**ऋषि, विद्वान पुरुष और राजा के आने पर उन्हें मधुपर्क से सम्मानित किया जाता है (पुंसवन्, सोमयाग आदि) यज्ञक्रिया के आरम्भ में ऋत्विज को मधुपर्क दिया जाता है। मामा और श्वशुर यदि एक वर्ष के बाद आये हों तो वे अर्घ्य होते हैं ॥ ३७ ॥
प्राप्ताः प्रभासादभ्यागताः। क्रियारम्भः पुंसवनसोमयागादीनामारम्भः। संवत्सरपर्यागतौ संवत्सरमुषित्वाऽऽगतौ ॥ ३७ ॥
अग्न्यगारे गवां मध्ये ब्राह्मणानां च सन्निधौ।
स्वाध्याये भोजने चैव दक्षिणं बाहुमुद्धरेत् ॥ ३८ ॥