भारतकोश
बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

Baudhayana Dharmasutra Hindi

महर्षि बौधायन द्वारा

स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)

DevanagariHindipublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 486 में से

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पृष्ठ 273

.षष्ठ : खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने तृतीयोऽध्यायः २२१

अनु०—जिस घर में अग्नि का आधान किया गया हो उसमें प्रवेश करते समय गायों के बीच में जाने पर, ब्राह्मणों के समीप, दैनिक स्वाध्याय के अवसर पर तथा भोजन के समय दाहिने हाथ को उठावे ॥ ३८ ॥

टि०—सूत्रस्थ 'च' शब्द से अन्य पवित्र स्थानों और शुभ अवसरों पर भी हाथ उठाने का नियम समझना चाहिए।

स्वाध्याये वर्तमाने भोजनेऽपि बाहोरुद्धरणं नमस्काररूपेण । चशब्दः प्रशस्तमङ्गल्यदेवायतनप्रज्ञातवनस्पत्यादिप्रदर्शनार्थः ॥ ३८ ॥

उत्तरं वासः कर्तव्यं पञ्चस्वेतेषु कर्मसु ।
स्वाध्यायोत्सर्गदानेषु भोजनाचमनयोस्तथा ॥ ३९ ॥

अनु०—इन पांच कामों में उत्तरीय वस्त्र अवश्य धारण करना चाहिए। स्वाध्याय, मूत्रमलत्याग, दान, भोजन तथा आचमन के समय ॥ ३९ ॥

तृतीयं वस्त्रमुपवीतवत् व्यतिषज्यते तदुत्तरीयम् । तत् स्नातकस्य प्राप्यम्-प्येषु कर्मस्ववश्यं कर्तव्यमित्युच्यते । उत्सर्गो मूत्रपुरीषकरणम् ॥ ३९ ॥

हवनं भोजनं दानमुपहारः प्रतिग्रहः ।
बहिर्जानु न कार्याणि तद्वदाचमनं स्मृतम् ॥ ४० ॥

अनु०—हवन क्रिया में भोजन करते समय, देवता गुरु आदि को बलि या उपहार देते समय तथा दान लेते समय दाहिने हाथ को घुटने से बाहर नहीं करना चाहिए और इसी प्रकार आचमन के विषय में भी नियम बताया गया है ॥ ४० ॥

जान्वोर्द्वयोरन्तरा दक्षिणं बाहुं विधायैतानि कार्याणीत्यर्थः । उपहारो बलिहरणम् । यद्वा—प्रसिद्ध एवोपहरो देवगुरुविषयः ॥ ४० ॥

अन्नदानं स्तूयते—
अन्ने श्रितानि भूतानि अन्नं प्राणमिति श्रुतिः ।
तस्मादन्नं प्रदातव्यमन्नं हि परमं हविः ॥ ४१ ॥

अनु०—प्राणी अन्न के ऊपर आश्रित होते हैं और अन्न ही प्राण है ऐसा श्रुति का वचन है अतः अन्न का दान करना चाहिए। अन्न ही सबसे उत्तम हवि है ॥ ४१ ॥

अन्ने श्रितानि अन्नावष्टम्भानि स्थावराणि जङ्गमानि च । 'अन्नं प्राणमन्नपान' मिति श्रुतिः । देवा अप्यन्नावष्टम्भा एव । हुतप्रहुतादयस्तेषामन्नानि तस्माद्यथाशक्त्या दातव्यम् ॥ ४१ ॥