बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२५० बौधायन-धर्मसूत्रम् [ सन्न्यासिसधर्मा:
ब्रह्मचायंत्र नैष्ठिको गृह्यते । नोपकुर्वाणः ॥ १४ ॥
अथैतेषां क्रमेण धर्मानाचष्टे—
ब्रह्मचारी गुरुशुश्रूष्याममरणात् ॥ १५ ॥
अनु०—ब्रह्मचारी मृत्यु तक गुरु की सेवा करे ॥ १५ ॥
शुश्रूषाऽस्मिन्नस्तोति शुश्रुषी। आ मृत्योः गुरुकुले वसेत् । ये पुनरग्नीन्ध-नाद्यो धर्मा उपकुर्वाणस्योक्ताः तेऽप्यस्य विद्यन्त एव ॥ १५ ॥
वानप्रस्थो वैखानसशास्त्रसमुदाचारः ॥ १६ ॥
वैखानसो वने मूलफलाशी तपश्शीलः सवनेषूदकमुपस्पृशञ्छा-मणकेनाऽग्निमाधाय।ऽग्राम्यभोजी देवपितृभूतममुष्यर्षिपूजकः सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्जं भैक्षमप्युपयुञ्जीत न फालकृष्टमधितिष्ठेद् ग्रामं च न प्रविशे-ज्जटिलश्चीराजिनवासा नाऽतिसंवत्सरं भुञ्जीत ॥१७ ॥
अनु०—वानप्रस्थ विखनस् ऋषि द्वारा उपदिष्ट शास्त्र के अनुसार आचरण करता है । वैखानस अर्थात् विखनस् के अनुसार आचरण करनेवाला वानप्रस्थ वन में निवास करे, मूलों और फलों का भोजन करे । तपस्या करे, तीनों सवन-प्रातः, मध्याह्न, सायं में स्नान करे । वैखानसशास्त्र में बतायी गयी श्रामण विधि के अनुसार अग्नि का आधान करे । ग्राम में उत्पन्न अन्नादि का भोजन न कर वन में उत्पन्न अन्नादि का ही भोजन करे । देव, पितृ, प्राणी, मनुष्य और ऋषि की पूजा करे । सभी वणों के पुरुषों का अतिथि-सत्कार करे, तथापि उनसे परहेज रखे जिनका सम्पर्क निषिद्ध है। व्याघ्रादि हिंसक पशुओं द्वारा मारे गये हिरणादि पशुओं के मांस का भक्षण कर सकता है । जोती गयी भूमि पर पैर न रखे, गाँव में प्रवेश न करे । जटाएँ धारण करे, वृक्षों की छाल या मृगचर्म वस्त्र के रूप में धारण करे । किसी अन्न का भक्षण न करे जो एक वर्ष से अधिक समय तक संगृहीत किया गया हो ॥ १६-१७ ॥
टि०—कुछ प्रतियों में ‘वैष्कम्' के स्थान पर ‘भैक्षम्' है, किन्तु गोविन्द स्वामी की व्याख्या के अनुसार ‘वैष्कम्’ ही होना चाहिए, जिसका तात्पर्य है हिंसक पशुओं द्वारा मारे गये पशु का मांस ।
वने प्रतिष्ठित इति वानप्रस्थः । वैखानसोऽपि वानप्रस्थ एव । संज्ञान्तर-करणं तु संव्यवहारार्थम् । विखनसा ऋषिणा प्रोक्तं वैखानसशास्त्रम् । तत्र हि बहवो धर्मा वानप्रस्थस्योक्ताः 'ग्रीष्मे पञ्चतपाः' इत्यादयः । समुदाचारः समाप्ताचार इत्यर्थः । वने मूलफलान्यश्नन् प्रतिषिद्धानि परिहरेत् । तपश्शीलः