बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें| २७६ | बौधायन-धर्मसूत्रम् | [ श्राद्धविधिः |
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जयप्रभृति यथाविधानम् ॥ ८ ॥
अनु०--जय प्रभृति दाविहोम की उत्तरवर्ती क्रियाएं पूर्वक करे ॥ ८ ॥
दार्बिहोमिकमुत्तरतन्त्रं कर्तव्यमित्यर्थः ॥ ८ ॥
शेषमुक्तमष्टकाहोमे ॥ ९ ॥
अनु०--शेष नियमो का विवेचन अष्टका होम के संबन्ध में किया गया है ॥ ९॥
इतोऽधिकमष्टकाहोमादवगमयितव्यम् । 'आशयेष्वन्नशेषान् सम्प्रकिरन्ति' इत्यादि । अनेनैतत् ज्ञापितं भवति—मासिश्राद्धस्यैवेदं प्रयोगान्तरमिति ॥ ९॥
¹द्वौ देवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा ।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे ॥ १० ॥
अनु०—देवकार्य में दो ब्राह्मणों को, पितृकर्म में तीन ब्राह्मणों को अथवा इन दोनों कर्मों में एक-एक ब्राह्मण को भोजन करावे अधिक समृद्ध होने पर भी इनसे अधिक संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराने की ओर प्रवृत्त न होवे ॥ १० ॥
देवे वैश्वदेवे ॥ १० ॥
इतरथा दोषमाह—
²सत्क्रियां देशकालौ च शौचं ब्राह्मणसम्पदम् ।
पञ्चैतान्विस्तरो हन्ति तस्मात्तं परिवर्जयेत् ॥ ११ ॥
अनु०—अधिक संख्या में ब्राह्मणों को भोजन कराने पर इन पाँचों का विनाश होता है—सत्कार, देश और समय के औचित्य का, पवित्रता का तथा योग्य ब्राह्मणों की उपलब्धि का। अतः ब्राह्मणों की संख्या के विस्तार का परित्याग करना चाहिए ॥ ११ ॥
कारुण्यात् स्नेहात् लोकगर्हाभयाद्वा श्राद्धविस्तरे प्रसक्ते सति प्रतिषेधः ॥ ११ ॥
उरस्तः पितरस्तस्य वामतश्च पितामहाः ।
दक्षिणतः प्रपितामहाः पृष्ठतः पिण्डतर्कका इति ॥ १२ ॥
इति द्वितीयप्रश्ने पञ्चदशः खण्डः ॥
अनु०—सामने की ओर से उसके पितृगण, बाएं की ओर से पितामह, दाहिने से
१ See. मनु. ३. १२५.
२. See. मनु. ३. १२६.