बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशः खण्डः ] द्वितीयप्रश्ने नवमोऽध्यायः २७७
प्रपितामह और पीछे से पिण्ड की इच्छा करने वाले मातामहादि (पिण्ड ग्रहण करते हैं) ॥ १२ ॥
श्रद्धासञ्जननार्थवादः। पिण्डतर्ककाः पिण्डचिन्तकाः मातामहादयः॥१२॥
इति श्रीगोविन्दस्वामिकृते बौधायनधर्मविवरणे द्वितीयप्रश्नेऽष्टमोऽध्यायः।
द्वितीयप्रश्ने नवमोऽध्यायः
षोडशः खण्डः
औरसेन हि पुत्रेणर्णापाकरणं भवति । तत्तत्प्रशंसार्थमाह—
प्रजाकामस्योपदेशः ॥ १ ॥
अनु०—अब उत्तम पुत्र चाहने वाले के लिए उपदेश दिया जाता है ॥१॥
प्रजा सत्पुत्रः, तत्कामस्योपदेशः करिष्यते ॥ १ ॥
प्रजनननिमित्ता समाख्येत्यश्विनावूचतुः ॥ २ ॥
अनु०—पुत्र उत्पन्न करने से ही प्रसिद्धि मिलती है ऐसा अश्विन देवों ने कहा है ॥ २ ॥
प्रजननमुत्पादनं तन्निमित्ता पुत्र इति समाख्या प्रसिद्धिरित्यर्थः । न तु दानादिनिमित्ता पुत्रसमाख्या । अतो दत्तादिरत्रप्रतिनिधिः । तत्रैते ऋचौ भवतः-‘परिषद्वां ह्यररणस्य रेक्णो’ ‘न हि प्रभायारणस्सुशेवः’ इति ॥
प्रजाकामस्योपदेश इत्युक्तम् । कोऽसावुपदेश इत्याह—
आयुषा तपसा युक्तस्स्वाध्यायेज्यापरायणः ।
प्रजामुत्पादयेद्युक्तस्स्वे स्वे वंशे जितेन्द्रियः ॥ ३ ॥
अनु०—आयु और तप की वृद्धि करने वाली क्रियाएं कर, स्वाध्याय और यज्ञ में तत्पर होकर तथा अपनी इन्द्रियों को वश में रखकर विधिपूर्वक अपने ही वंश में सन्तान उत्पन्न करे ॥ ३ ॥
टि०—'अपने ही वंश में' से तात्पर्य यह है कि अपने ही वर्ण की स्त्री से । 'जितेन्द्रिय' से यहाँ जननेन्द्रिय के संयम का संकेत किया गया है, अर्थात् पर स्त्री से व्यभिचार न करे और अपनी पत्नी से भी उचित काल में ही सम्बन्ध रखे ।