बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)

बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
DevanagariHindipublished486 पृष्ठ
पृष्ठ 33, कुल 486 में से
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[ २६ ]
| बौधायन ३. १० | गौतम ३. १ |
|---|---|
| उपसन्न्यायेन पयोव्रतता शाकभक्षता फलभक्षता मूलभक्षता प्रसृतयावको··· ॥१२॥ | पयोव्रता शाकभक्षता फलभक्षता प्रसृतयावको हिरण्यप्राशनं घृतप्राशनं सोमपानमिति मेध्यानि ॥ १३ ॥ |
| सर्वे शिलोञ्चयाः सर्वाःस्रवन्त्यः सरितः पुण्याह्रदास्तीर्थान्यृषिनिकेतनानि गोष्ठक्षेत्र-परिक्वन्दा इति देशाः ॥ १३ ॥ | सर्वे शिलोञ्चयाः सर्वाः स्रवन्त्यः पुण्या ह्रदास्तीर्थान्यृषिनिवासा गोष्ठपरिकस्कन्धा इति देशाः ॥ १४ ॥ |
| अहिंसा सत्यमस्तेन्यं सवनेषूदको-पस्पर्शनं गुरुशुश्रूषा ब्रह्मचर्यमधश्शयन-मेकवस्त्रताऽनाशक इति तपांसि ॥ १४ ॥ | ब्रह्मचर्यं सत्यवचनं सवनेषूदकोस्पर्शन-मार्द्रवस्त्रताऽधः शयिताऽनाशक इति तपांसि ॥ १५ ॥ |
| हिरण्यं गौर्वासोऽश्वो भूमितिला घृतमन्नमिति देयानि ॥ १५ ॥ | हिरण्यं गौवासोश्वोभूमस्तिला घृत-मन्नमिति देयानीति ॥ १६ ॥ |
| संवत्सरः षण्मासाश्चत्वारस्त्रयो द्वावेक-श्चतुर्विंशत्यहो द्वादशाहष्षडहस्त्र्यहोऽहो-रात्रमेकाह इति कालाः ॥ १६ ॥ | संवत्सरः षण्मासाश्चत्वारस्त्रयो वा द्वौ वौकश्चतुर्विंशत्यहो द्वादशाह षडहस्त्र्यहोऽहो रात्र इति कालाः ॥ १७ ॥ |
| एतान्यनादेशे क्रियेरन्नेनस्सु गुरुषु गुरूणि लघुषु लघूनि ॥ १७ ॥ | एतान्येवानादेशे विकल्पनेन क्रियेरन् ॥ |
| कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्व-प्रायश्चित्तिः सर्वप्रायश्चित्तिः ॥ १८ ॥ | कृच्छ्रातिकृच्छ्रौ चान्द्रायणमिति सर्व-प्रायश्चित्तं सर्वप्रायश्चित्तम् ॥ २० ॥ |
उपर्युक्त सूत्रों की समानता से यह स्पष्ट है कि बौधायन ने गौतम के सूत्रों को प्रायः ज्यों-के-त्यों ग्रहण कर लिया है और समूचा अध्याय उद्धृत कर दिया है, केवल दो ही सूत्र छूट गये हैं और सूत्रों में एकाध शब्दों का ही अन्तर दिखायी पड़ता है।
इसके अतिरिक्त 'बौधायनधर्मसूत्र' के २. ११. १७ से २३ तक के सूत्र गौतमधर्मसूत्र १. ३. २५–३४ तक के सूत्रों से मिलते-जुलते हैं —
| गौतम १. ३ | बौधायन २. ११ |
|---|---|
| वैखानसो वने मूलफलाशी तपः-शीलः ॥ २५ ॥<br>श्रावणकेनाग्निमाधाय ॥ २६ ॥<br>अग्राम्यभोजी ॥ २७ ॥<br>देवपितृमनुष्यभूतर्षिपूजकः ॥ २८ ॥<br>सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्जम् ॥ २९ ॥<br>भैक्षमप्युपयुञ्जीत ॥ ३० ॥<br>न फलकृष्टमधितिष्ठेत् ॥ ३१ ॥<br>ग्रामं च न प्रविशेत् ॥ ३२ ॥<br>जटिलश्चीराजिनवासाः ॥ ३३ ॥<br>नातिसंवत्सरं भुञ्जीत ॥ ३४ ॥ | वैखानसो वने मूलफलाशी तपःशीलः सवनेषूदसमुपस्पृशञ्श्रामणकेनाग्निमाधायाऽग्राम्यभोजी देवपितृभूतमनुष्यर्षिपूजकः सर्वातिथिः प्रतिषिद्धवर्जं भैक्षमप्युपयुञ्जीत न फालकृष्टमधितिष्ठेद् ग्रामं च न प्रविशेज-टिलश्चीराजिनवासा नातिसंवत्सरं भुञ्जीत ॥ १७ ॥ |
इसी प्रकार गौतम १. ३. ३५ तथा बौधायन २. ११. २९ में समानता है।