बौधायन धर्मसूत्र (विवरण टीका व हिन्दी अनुवाद)
Baudhayana Dharmasutra Hindi
महर्षि बौधायन द्वारा
स्रोत: Baudhayana Dharmasutram with Vivarana & Hindi Translation by Dr. Umesh Chandra Pandey (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः खण्डः] द्वितीयप्रश्ने दशमोऽध्यायः २८१
अनु०—उस (पुत्रोत्पत्ति के इच्छुक) व्यक्ति के लिए उपदेश श्रुति के वचनों के अनुसार ही दिया गया है ॥ १३ ॥
तस्य प्रजोत्पादने यत्नवतः औषधाद्युपदेशोऽस्माभिरुपदिश्यते । केन मूलज्ञानेनेति ? श्रुतिसामान्येन श्रुतेस्समानभावस्तुल्यता ऐकरूप्यं श्रुतिसामान्यं तेन । किमुक्तं भवति ? प्रजामुत्पादयेदित्यस्याः श्रुतेः पुत्रकामेष्ट्याः, औषध-मन्त्रादिषु चैकरूपेणाऽऽपेक्षितत्वादिति ॥ १३ ॥
इदानीमृणश्रुतौ ब्राह्मणग्रहणं क्षत्रियवैश्ययोरपि प्रदर्शनार्थमेतदित्याह— सर्ववर्णेभ्यः फलवत्त्वादिति फलवत्त्वादिति ॥ १४ ॥
इति बोधायनीये धर्मसूत्रे द्वितीयप्रश्ने षोडशः खण्डः ॥
अनु०--क्योंकि यह सभी वर्णों के प्रयोजन सिद्ध करने से फल प्रदान करता है ॥ १४ ॥
फलवत्त्वात् प्रयोजनवत्त्वात् । फलमिहोपनयनस्याऽध्ययनम्, तच्च वेदार्थ-ज्ञानाद्युपयुक्तत्वात् त्रैवर्णिकानामित्यर्थः । यद्वा—फलवत्त्वात् औषधमन्त्रा-देरपि ॥ १४ ॥
इति श्रीगोविन्दस्वामिकृते बौधायनीयधर्मविवरणे द्वितीयप्रश्ने नवमोऽध्यायः ॥
द्वितीयप्रश्ने दशमोऽध्यायः
सप्तदशः खण्डः
अथाऽतस्सन्न्यासविधिं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
अनु०—अब हम यहाँ से संन्यास के नियमों की व्याख्या करेंगे ॥ १ ॥
सम्यक् न्यासः प्रतिग्रहाणां सन्न्यासः । विधिर्विधानमितिकर्तव्यता ॥ १ ॥
सोऽत एव ब्रह्मचर्यवान् प्रव्रजतीत्येकेषाम् ॥ २ ॥
अनु०—कुछ आचार्यों का मत है कि ब्रह्मचर्याश्रम समाप्त करने के बाद ही संन्यास ग्रहण किया जा सकता है ॥ २ ॥
टि०—गर्भाधानादि संस्कार से संस्कृत, वेदाध्ययन से सम्पन्न, ब्रह्मचर्यव्रत के नियमों का पालन कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने योग्य व्यक्ति भी संन्यास आश्रम में प्रवेश कर सकता है यह विचार इस कारण है कि ब्रह्मचर्याश्रम में ब्रह्म के विषय